।। काल ब्रम्हले कविर देवसंग गरेको बिन्ति ।। सन्त कबिर।।
काल ।। ज्योती निरन्जन ।। क्षर ब्रम्ह द्वारा बिन्ति
सतयुग त्रेता द्धापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे जाही ।।
चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरन जीव बहु जाई ।। ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ।।
पुर्ण ब्रम्ह कबिरदेव द्वारा काललाइ उत्तर
अरे काल परपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ।।
बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहँ ठगे काल अभिमानी ।।
चौथा युग जब कलऊ आई । तबह म अपनो अंश पठाई ।।
काल फन्द छुटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ।।
घर घर देखो बोध बिचारा । सत्य नाम सब ठौर उचारा ।।
पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यस बचन होयगा सांचा ।।
कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ।। सत साहेब ।।
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