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Wednesday, 31 December 2014

Evry thing is distraoble

महाप्रलय में ब्रह्मण्ड में बना ब्रह्मलोक भी नष्ट हो जाता है।।

गीता अध्याय 8 के श्लोक 16 में स्पष्ट है कि हे अर्जुन! ब्रह्म लोक से लेकर सबलोक बारम्बार उत्पत्ति व नाश वाले हैं। जो यह नहीं जानते वे मुझे प्राप्त होकर भी जन्म-मृत्यु को ही प्राप्त होते है। पूर्ण मुक्त नहीं होते। अन्य अनुवाद कर्ताओं ने लिखा है कि मुझे प्राप्त करने का पुर्नजन्म नहीं होता।

विचार करे यदि यह अनुवाद ठीक माना जाए तो गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5,9 अध्याय 10 श्लोक 2 का अर्थ-निर्थक हो जाता है। जिनमें गीता ज्ञान दाता कह रहा है कि अर्जुन तेरे तथा मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं तू नहीं जानता में जानता हूँ। फिर अध्याय 18 श्लोक 62 तथा अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि पूर्ण मोक्ष के लिए पूर्ण परमात्मा की भक्ति कर।

विशेष:-- इसमें ब्रह्म (काल) कह रहा है कि ब्रह्म लोक तक सर्व लोक नाशवान हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा इनके लोकों के प्राणी भी नहीं रहेंगे। फिर उनके उपासक कहाँ रहेंगे? देवी-देवता भी नहीं रहेंगे। फिर पूजारी कहाँ रहेंगे? अर्थात् कोई प्राणी मुक्त नहीं। न ब्रह्मा लोक में पहुँचे हुए, न विष्णु लोक में पहुँचे हुए, न शिव व ब्रह्म लोक में पहुँचे हुए। फिर मुझे प्राप्त ( अर्थात् काल ब्रह्म { जिसका मन्त्र जाप केवल ‘ॐ’ है } को प्राप्त) का भी पुर्नजन्म है। क्योंकि ब्रह्म लोक भी नष्ट होवेगा इसलिए ब्रह्म तक के साधक कोई भी मुक्त नहीं।


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