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Friday, 20 March 2015

Kabir vaani in hidi


संतो पांडे निपुण कसाई।
बकरा मारि भैंसा पर धावै,दिल मँह दर्द न आई।।
करि अस्नान तिलक दै बैठे,विधि से देवि पुजाई।
आतम राम पलक में बिनसे,रूधिर की नदी बहाई।।
अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये,सभा माँहि अधिकाई।
इनते दीक्षा सब कोई मांगै,हाँसि आवै मोहि भाई।।
पाप कटन को कथा सुनावै,कर्म करावै नीचा।
हम तो दोउ परस्पर देखा,गहे हाथ यम खींचा।।
गाय बंधे ते तूरूक कहिये,इनते वै क्या छोटे।
कहँहि कबीर सुनो भाई संतो,कलि मँह ब्राह्मण खोटे।।

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