साहेब कबीर जी की वाणी मे गुरु का महातम>>>>गुरु ते अधिक न कोई ठहरायी। मोक्षपंथनहिं गुरु बिनु पाई।।राम कृष्ण बड़ तिहुँपुर राजा।तिन गुरु बंदि कीन्ह निज काजा।।गेही भक्ति सतगुरु की करहीं। आदि नाम निजहृदयधरहीं।।गुरु चरणन से ध्यान लगावै। अंत कपट गुरुसे ना लावै।।गुरु सेवा में फल सर्बस आवै। गुरुविमुख नर पार न पावै।।गुरु वचन निश्चय कर मानै।पूरे गुरु की सेवा ठानै।।गुरुकी शरणा लीजै भाई।जाते जीव नरक नहीं जाई।।गुरु कृपा कटे यमफांसी। विलम्ब ने होय मिले अविनाशी।।गुरुबिनुकाहु न पाया ज्ञाना। ज्यों थोथा भुस छड़ेकिसाना।।तीर्थ व्रत अरू सब पूजा। गुरु बिनदाता और न दूजा।।नौ नाथ चैरासी सिद्धा। गुरुकेचरण सेवे गोविन्दा।।गुरु बिन प्रेत जन्म सब पावै।वर्ष सहंस्र गरभ सो रहावै।।गुरु बिन दान पुण्यजो करई। मिथ्या होय कबहूँ नहीं फलहीं।।गुरु बिनुभर्म न छूटे भाई।कोटि उपाय करे चतुराई।।गुरु केमिले कटे दुःख पापा। जन्म जन्म के मिटेंसंतापा।।गुरु के चरण सदा चित्त दीजै। जीवन जन्मसुफल कर लीजै।।गुरु भगता मम आतम सोई। वाकेहृदय रहूँ समोई।।अड़सठ तीर्थ भ्रम भ्रम आवे।सो फल गुरु के चरनों पावे।।दशवाँ अंश गुरुको दीजै। जीवन जन्म सफल कर लीजै।।गुरु बिनहोमयज्ञ नहिं कीजे। गुरु की आज्ञा माहिं रहीजे।।गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना। पावै चरनमुक्ति परवाना।।तन मन धन अरपि गुरु सेवै। होयगलतान उपदेशहिं लेवै।।सतगुरुकी गति हृदय धारे।और सकल बकवाद निवारै।।गुरु के सन्मुख वचन नकहै। सो शिष्य रहनिगहनि सुख लहै।।गुरु से शिष्यकरै चतुराई। सेवा हीन नर्क में जाई।।रमैनी:शिष्यहोय सरबस नहीं वारै।हिये कपट मुखप्रीति उचारे।।जो जिव कैसे लोक सिधाई। बिन गुरु मिले मोहेनहिं पाई।।गुरु से करै कपट चतुराई। सो हंसा भवभरमें आई।।गुरु से कपट शिष्य जो राखै। यमराजा के मुगदर चाखै।।जो जन गुरु की निंदा करई।सूकर श्वान गरभमें परई।।गुरु की निंदा सुनेजो काना। ताको निश्चय नरक निदाना।।अपनेमुखनिंदा जो करई। परिवार सहित नर्क में पड़ही।।गुरुको तजै भजै जो आना। ता पशुवा को फोकटज्ञाना।।गुरुसे बैर करै शिष्य जोई। भजन नाश अरुबहुत बिगोई।।पीढि सहित नरकमें परिहै। गुरुआज्ञा शिष्य लोप जो करिहै।।चेलो अथवा उपासकहोई। गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई।।निश्चय नर्कपरै शिष्य सोई। वेद पुराण भाषत सब कोई।।सन्मुखगुरुकी आज्ञा धारै। अरू पिछे तै सकल निवारै।।सो शिष्य घोर नर्कमें परिहै। रुधिर राध पीवैनहिं तरि है।।मुखपर वचन करै परमाना। घर पर जायकरैविज्ञाना।।जहाँ जावै तहाँ निंदा करई।सो शिष्यक्रोध अग्नि में जरई।।ऐसे शिष्यको ठाहर नाहीं।गुरु विमुख लोचत है मनमाहीं।।बेद पुराण कहै सबसाखी। साखी शब्द सबै यों भाखी।।मानुष जन्मपायकर खोवै। सतगुरु विमुखा जुगजुग रोवै।।गरीब, गुरुद्रोही की पैड़ पर, जे पग आवै बीर।चैरासी निश्चयपड़ै, सतगुरु कहैं कबीर।।कबीर, जान बूझसाची तजै, करैं झूठे से नेह।जाकि संगत हेप्रभु, स्वपन में भी ना देह।।तातै सतगुरुसरना लीजै। कपट भाव सब दूर करीजै।।योग यज्ञजपदान करावै।गुरु विमुख फल कबहुँ न पावै।
Sunday, 19 October 2014
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साहेब कबीर जी की वाणी मे गुरु का महातम
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mahraj garib dass ji ki vaani
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