परोपकार एवं परमार्थ-परोपकार तो उपकार ही होता है। परोपकार तो धनाढय ही कर सकता है। स्कूल बनवा दिया, पाठशाला, धर्मशाला, कुएं बनवा दिये औरअगर वह निष्पक्ष होकर येकाम करता है। कोई उसको स्वार्थ नहीं है तो उसका फल उसको बहुत उचा मिलता है। किसी की शराब छुटवा दी। ये परोपकार ही तो है। ये परमार्थ नहीं है। किसी का भला या उपकार कर देना परोपकार कहलाता है ।परमार्थ तो कोई भागी ही करके जाता है। परमार्थ कर दिया तो उद्धार हो गया। परमार्थ उसे कहते हैं जो अपनी जीवात्मा व सुरत को नौ चक्रों से निकाल कर दसवीं गली में उपर ले जाए। वह भागी है। वह परमार्थ करता है। उसका नाम परमार्थ है। वह तो संत ही करते हैं। वे उस सुरत का आना जाना छुटवा देते हैं।
Wednesday, 22 October 2014
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