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Thursday, 1 January 2015

Lok ved

पीछे लगा जाऊं थी लोक वेद के साथ
आगे से सतगुरु मिल गये दीया लेके हाथ
जीवन बीतता है दिन-प्रतिदिन। एक एक घड़ी निकलती जाती है ।एक एक दिन हमें मौत के पास लेके आता है । पर जब मौत होतीहै तो हम समझते है कि हमेशा दूसरे की मौत होती है । हम यहभूल जाते है कि ये हमारे साथ भी होगा । हम हर वर्ष अपने जन्मदिन का उत्सव मनाते है और ये भूल जाते है कि हम हर वर्ष उस क्षण के नजदीक चले जा रहे है । हमने इस अनमोल मानव जीवन को पाया और यूँ ही गवां दिया । हमें हर क्षण प्रभु के ध्यान में बितानी चाहिए क्योंकि पलटू कहते है कि “पलटू शुभ दिन, शुभ घड़ी, याद पड़े हरी नाम, लगन, मुहूर्त झूठ सब और बिगाड़े काम ।“ आपने देखा होगा कि जब आदमी मृत्यु के नजदीक होता है तब वह बहुत ही पीड़ित और दयनीय स्थिति में होता है क्योंकि उसने अपना पूरा जीवन उस कचरे को इकट्ठा करनेमें निकाला जिसका कोई मूल्य नहीं है । हमने पूरा जीवन व्यर्थ गवां दिया । इसी चीज को जब हम अपने आखिरी समय में महसूस करते है और सोचते है कि यह अनमोल जीवन यूँ ही गंवाया तब हम निराशा में घिरजाते है । हमें अपने जीवन में सतगुरु चाहिए । सतगुरु वह है जो आपको वह ज्ञान दे जिससे आपके अंदर ‘जागरण’ आये । जो सिद्धांत देता है वह ‘असतगुरु’ है । किसी भी तरह के वेद ग्रन्थ को हमने जाना, हमने पाया कि इसकी गवाही तो हो सकती है पर हमें वह दीया नहीं दे सकते जो सतगुरु दे सकते है । सतगुरु जिन्दा है और वेद सिद्धांत मुर्दा। मुर्दा कभी किसी को कहीं पंहुचा नहीं सकता है । जिन धर्मों में जबतक धर्म गुरु थे तब तक उन धर्मों में क्रांति थी । पर जब धर्मों ने एक समय के बाद ग्रन्थों को ही अपना गुरु मान लिया तब से वे धर्म क्रन्तिकारी नहीं रहे क्योंकि उसके पीछे कोई जिन्दा सोच नहीं है जो उस सिद्धांत को, उस ग्रन्थ वाणी को लोगों को समय और परिस्थिति के अनुरूप जीवन में कैसे उतारे,

सतगुरु कूं सिजदा करूँ, कर्म छुटाए कोट
जो सतगुरु की निंदा करे, यम तोड़ेंगे होठ


Posted via Blogaway

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