गरीब, सुपच रूप धरि आईया,
सतगुरु पुरुष कबीर।
तीन लोक
की मेदनी, सुर
नर मुनिजन भीर।।97।।
गरीब, सुपच रूप धरि आईया,
सब देवन का देव।
कृष्णचन्द्र पग धोईया,
करी तास
की सेव।।98।।
गरीब, पांचैं पंडौं संग हैं,
छठ्ठे कृष्ण मुरारि।
चलिये हमरी यज्ञ में,
समर्थ सिरजनहार।।99।।
गरीब, सहंस
अठासी ऋषि जहां,
देवा तेतीस कोटि।
शंख न बाज्या तास तैं, रहे चरण में
लोटि।।100।।
गरीब, पंडित द्वादश
कोटि हैं, और चैरासी सिद्ध।
शंख न बाज्या तास तैं, पिये मान
का मध।।101।।
गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ
में, सतगुरु किया पियान।
पांचैं पंडौं संग चलैं, और छठा भगवान।।
102।।
गरीब, सुपच रूप
को देखि करि,
द्रौपदी मानी शंक।
जानि गये जगदीश गुरु,
बाजत नाहीं शंख।।103।।
गरीब, छप्पन भोग संजोग
करि, कीनें पांच गिरास।
द्रौपदी के दिल दुई हैं,
नाहीं दृढ़ विश्वास।।104।।
गरीब, पांचैं पंडौं यज्ञ
करी, कल्पवृक्ष
की छांहिं।
द्रौपदी दिल बंक हैं, शंख
अखण्ड बाज्या नांहि।।105।।
गरीब, छप्पन भोग न
भोगिया, कीन्हें पंच गिरास।
खड़ी द्रौपदी उनमुनी,
हरदम घालत श्वास।।107।।
गरीब, बोलै कृष्ण
महाबली, क्यूं
बाज्या नहीं शंख।
जानराय जगदीश गुरु, काढत
है मन बंक।।108।।
गरीब,
द्रौपदी दिल कूं साफ करि,
चरण कमल ल्यौ लाय।
बालमीक के बाल सम,
त्रिलोकी नहीं पाय।।
109।।
गरीब, चरण कमल कूं धोय
करि, ले द्रौपदी प्रसाद।
अंतर सीना साफ होय, जरैं
सकल अपराध।।110।।
गरीब, बाज्या शंख सुभान
गति, कण कण भई अवाज।
स्वर्ग लोक
बानी सुनी,
त्रिलोकी में गाज।।111।।
गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ
में, आये नजर निहाल।
जम राजा की बंधि में, खल
हल पर्या कमाल।।113।।
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