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Sunday, 28 December 2014

Kabir vaani

कबीर,मांस अहारी मानईं,
ताकी संगति मति करै,
होई भक्ति मेँ हानि ।।
कबीर,माँस मछलिया खात हैँ,सुरापान के हेत ।
ते नर नरकै जाहिँगे ,
माता पिता समेत ।।
गऊ अपनी अम्मा है ,
इस पर छुरी न बाह ।
गरीब दास घी दुध को ,
सब ही आत्म खाय ।।
कबीर,दिनको रोजा रहत है,
रात हनत हैँ गाय ।
यह खून वह बंदगी ,
कहुं क्योँ खुशी खुदाय ।।
कबीर,खूब खाना है खीचडी,
मांहीँ परी टुक लौन ।
मांस पराया खायकै ,
गला कटावै कौन ।।
मुसलमान गाय भखी ,
हिन्दु खाया सूअर ।
गरीबदास दोनोँ दीन से ,
राम रहिमा दुर ।।
गरीब, जीव हिँसा जो करत हैँ,
या आगै क्या पाप ।
कंटक जूनि जिहान मेँ ,
सिँह भेढिया और सांप ।।
आप कबीर अल्लाह हैँ ,
बख्सो इबकी बार ।
दासगरीब शाह कुं ,
अल्लाह रुप दीदार ।।


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