कबीर, राम नाम रटते रहो जब लग घट मेँ प्राण ,
कबहू तो भनक पड़ेगी,
दीन दयाल के कान ।।
कबीर , गहै नाम सेवा करै ,
सतनाम गुण गावै ।
सतगुरु पद विश्वास दृढ़ ,
सहज परम पद पावै ।।
कबीर,साथी हमारे चले गऐ हम भी चालन हार ,
कोऐ कागज बाकी रह रही ताते लागरी वार ।।
कबीर, राम बुलावा भेजया दिया कबीरा रोये ।
जो सुख है सतसंग वो बेकूँठ(स्वर्ग) भी ना ।
कबीर,पढ़े पुराण और वेद बखाने ,
सतपुरुष जग भेद ना जाने ।
वेद पढ़े और भेद न जाने ,
नाहक यह जग झगड़ा ठाने।।
वेद पुराण यह करे पुकारा ।
सबही से इक पुरुष निरारा,
तत्वदृष्टा को खोजो भाई ,
पूर्ण मोक्ष ताहि तैँ पाई ।।
कःविः नाम जो बेदन मेँ गावा ,
कबीरन् कुरान कह समझावा ।
वाही नाम है सबन का सारा, आदि नाम वाही कबीर हमारा ।।
कबीर , सतगुरु के द्वारबार मेँ कमी काहे की नाहीँ ।
हँसा मौज ना पावता तेरी चूक चाकरी माही ।।
कबीर,टोटे मेँ भगति करेँ सोये सही सपूत ,
ये धारी मस्करे ना जाने कितने जा लिऐ ऊत ।।
कबीर,साँई योँ मति जानियोँ, प्रीति घटै मम चित्त ।
मंरु तो तुम सुमिरत मरुं ,
जीवत समरुँ नित्य ।।
गरीब, पूर्ण ब्रह्म कृपा निधान,सुन केशव करतार ।
गरीबदास मुझ दीन की ,
रखियो बहुत संभार ।।
कबीर,सहकामी भक्ति करै ,पावै उत्तम धाम ।
निहकामी भक्ति करै तो ,पावै निश्चल ठाम ।।
गरीब,निह इच्छा जो देत हैँ,
सोई दान कहावै ।
फल बाचै नहीँ तास का ,
मुक्ति पदार्थ पावै ।।
गरीब,निह इच्छा जो देत हैँ,
सोई दान कहावै ।
फल बाचै नहीँ तास का ,
मुक्ति पदार्थ पावै ।।
गरीब , गगन मण्डल गादी जहाँ , पार ब्रह्म अस्थान ।
सुन्न शिखर के महल मेँ ,
हंस करैँ विश्राम ।।
गरीब ,जम जौरा जासे डरैँ ,मिटेँ कर्म के लेख ।
अदली असल कबीर हैँ , कुल के सतगुरु एक ।।
गरीब,ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,है जिँदा जगदीश ।
सुन्न विदेशी मिल गया , छत्र मुकुट है शीश ।।
कबीर ,दुख मेँ सुमिरन सब करेँ ,
सुख मे करे ना कोय ।
सुख मे सुमिरन करे तो दुख काहे को होय ।
कबीर ,जीवित मृतक होये रहो, तजो खलक की आस ।रक्षक समर्थ सतगुरु ,ना दुःख पावे दास ।।
" कबीर, सुमिरण से सुख होत है ,
सुमिरण से दुःख जाए ।
कहै कबीर जो सुमिरण करे साँई माही समाए ।।"
सतगुरु बन्दीँ छोड़ स्वरुप है
रब दा ।
जो कुल मालिक है जी सब दा ।।
जहां संखो लहर मेहर की उपजैँ,
कहर जहां नहीं कोई ।
दासगरीब अचल अविनाशी,
सुख का सागर सोई ।।
।। सत साहिब ।।
सतगुरु दाता हैँ कलि माहिँ ,
प्राण उधारण उतरे सांई ।
सतगुरु दाता दीन दयालं,
जम किँकर के तोड़ेँ जालं ।।
>सत साहिब<
कबीर, कहते को कह जान देँ , गुरु की सिख तू लेय ।
साकट( दुष्ट) और सावान(कुत्ता) को उल्ट जवाब ना देय ।।
कबीर, सोया तो निष्फल गया , जोगो सो फल लेय ।
साहिब हक्क न राखसी ,
जब माँगै तब देय ।।
कबीर,संगत मे कुसंगत उपजेँ ,
जैसे बणखण्ड मेँ बाँस ।
आपा घिसघिस आग लगादेँ,
करे बणखण्ड का भी नाश ।।
सतगुरु बन्दीँ छोड़ स्वरुप है
रब दा ।
जो कुल मालिक है जी सब दा ।।
कबीर ,जो तोको काँटा बोयै ,वाकौ बौ तू फूल ।
तौहे फूल के फूल है , वाकौ है त्रिशूल ।
कबीर,जो जन मेरी शारन है , ताका हुँ मेँ दास ।
गेल गेल लाग्या फिरु चाहे धरती हो चाहे आकाश ।
कबीर, कहते को कह जान देँ , गुरु की सिख तू लेय ।
साकट( दुष्ट) और सावान(कुत्ता) को उल्ट जवाब ना देय ।।
कबीर, सत ना छोड़े सुरमा, सत छोड़े पत जा।
सत के बान्दी लक्ष्मी फेर मिलेगी आ ।
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