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Sunday, 19 October 2014

Satlok ka rahsya

बहुरि नहिं आवना या देस॥जो जो गएबहुरि नहि आए,पठवत नाहिं सेस ॥1॥सुर नर मुनि अरु पीरऔलिया,देवी देव गनेस ॥2॥धरि धरि जनम सबै,भरमे हैंब्रह्मा विष्णु महेस॥3॥जोगी जङ्गम औसंन्यासी,दीगंबर दरवेस ॥4॥चुंडित, मुंडित पंडितलोई,सरग रसातल सेस ॥5॥ज्ञानी, गुनी, चतुरअरु कविता,राजा रंक नरेस ॥6॥कोइ राम कोइरहिम बखानै,कोइ कहै आदेस ॥7॥नाना भेष बनाय सबै,मिलि ढूऊंढि फिरेंचहुँ देस ॥8॥कहै कबीर अंतना पैहो,बिन सतगुरु उपदेश ॥

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