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Sunday, 19 October 2014

Satlok, sachkhand,ritdham ki mahima

गरीब अजब नगर में ले गया, हम कूं सतगुरु आन |झिलके बिम्ब अगाध गति सूते चादर तान || ९१ ||अर्थ – आचार्य जी इन पंक्तियों में बता रहे हैं सतगुरु जी हम अपने जीवों को मृत्यु लोक से उस मालिक प्राण पुरष के अपने अलौकिक नगर में यहाँ पर एक अथाह तेज समूह सूर्य के प्रकाश समान कितने ही ऐसे गोलों के चमकते प्रकाश है, यहाँ की अति तीव्र गति है! वहाँ ला हमें अपने निश्छल निज स्वरूप में स्थित कर दिया और अपने निज ब्रह्म स्वरुप ब्रम्ह में लीनहोकर हमें आनंद में मगन कर दिया|गरीब अगम अनाहद दीप है, अगम अनाहद लोक |अगम अनाहद गवन है, अगम अनाहद मोख || ९२ ||अर्थ – वहाँ का लोक अगम है (वहाँ किसी की गति नहीं) अर्थात हरेक कोई वहाँ नहीं जा सकता और अनहद (बेहद, बेंअंत) हैं | वहाँ का जाना भी बेअंत है और वह का मोख (मोक्ष) भी बेअंत है| यह सब कुछ सद्गुरु की कृपा से प्राप्त हो सकता है|गरीब सतगुरु पारस रूप है, हमरी लोहा जात |पलक बीच कंचन करें, पलटे पिंडा गात || ९३ ||अर्थ—सद्गुरु महाराज का उपदेश तो पारस स्वरूप है| हमारा अंतः काल लोहेकी तरह कठोर है| सद्गुरु के उपदेश रूप पारस का जब हमारे ह्रदय रूप लोहे से स्पर्श होता है, तो वह पलक मात्र में ही सोना (मोक्ष का अधिकारी) बनादेते हैं| अर्थात सद्गुरु जी के उपदेश से हमारे अज्ञान का आवरण हट कर हमें ब्रम्ह चिंतन होने लागता है|सद्गुरु सत्संग व चरण स्पर्श से जीवन पलट जाता है, और पारस लोहे को सोनातभी बनाता है जब लोहे में जंगाल (जर) न हो| इस शंका का उत्तर सतगुरु जीआधी साखी में दे रहे हैं|गरीब हम तो लोहा कठिन है, सदगुरु मिले लुहार |जुगन-जुगन के मोर्चे, तोड़ घड़े घन सार || ९४ ||अर्थ--- महाराज जी कह रहे हैं कि हम तो बहुत ही कठिन लोहे के सामान है| जैसे अनेक वर्षों से पुराने लोहे के जंगाल को लुहार अग्नि में तपाकर और पीटकर शुद्ध कर देता है| अर्थात विकार निकाल देता है|उसी प्रकार सद्गुरु जी हमारे युग – युगान्तर के पाप रुपी मोर्चे (जंग)को लुहार की ही तरह अपने उपदेश रुपी हथौड़े से साधन रुपी अग्नि में तपाकरदूर कर देते हैं| अर्थात सद्गुरु जी अपने हँसो को अपने समान ही बनाकर उनमें अपने जैसी ही शक्ति ही भर देते हैं|गरीब हम पशुवा जान जीव हैं, सतगुर जात भिरंग |मुर्दे से जिन्दा करै, पलट धरत हैं अंग || ९५ ||अर्थ--- आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं कि हम तो पशु सामान जीवहैं, और सद्गुरु जी का स्वभाव कीट (भृंग) जैसा है| जैसे भृंगी(पतंगा) बाहर से पेट के बल चलने वाले जीव को पकड़ कर लाती है और अपने मिट्टी के बनाये हुए घर में बंद कर देती है और खुद बाहर बैठ कर भिनभिनाती रहती है जिसे सुनकर अंदर बैठा जीव डरता रहता है और उसका ध्यान भृंगी(पतंगा) पर ही रहता है कि पता नहीं वो कब आकार उसे मार दे| पर वो भृंगी अपने शब्द के बल से उस जीव को भी भृंगी ही बना देता है| और धीरे धीरे भृंगी की ही भाँती उसके सभी अंग तैयार हो जाते हैं और फिर वो उड़ जाता है और दूसरे जीवों को भृंगी बनाने लगता है|गरीब सतगुरु सिकली गर बनें, योह तन तेगा देह |जुगन - जुगन के मोर्चे, खोवें भरम संदेह || ९६ ||अर्थ-- सिकली गर ( लुहार) जैसे लुहार जर लगे लोहे को अपन सान्न पर चढाकर उसे चमका देता है उसी प्रकार सद्गुरु जी भी इस लोहे रुपी देह के जर जो युगों से भरम संदेह रूप से लगा हुआ था उसको अपने उपदेश और कृपा द्रष्टि से सान्न पर चढा कर दूर कर देते हैं अर्थात आत्म अनुभव करा देतेहैं|गरीब सतगुर कंद कपूर हैं, हमरी तुनका देह |स्वांति सीप का मेल है, चंद चकोरा नेह || ९७ ||महाराज जी कह रहे हैं कि महाराज जी केले के कपूर कि भाँती हैं जैसे केलेमें स्वाति नक्षत्र के समय बारिश कि बूंद पद जाये तो उसमे कपूर पैदा होता है और हमारा शरीर केले के पत्ते अर्थात तिनके कि तरह है| सद्गुरु के उपदेश रुपी बूंद के ह्रदय में पड़ने से ज्ञान रुपी कपूर उत्पन्न हो जाता है और स्वाति नक्षत्र में सीप में स्वाति बूंद पद जाने से मोती उत्पन्न होता है| सद्गुरु जी के प्रति ऐसा स्नेह हो जैसा कि चन्द्रमा केप्रति चकोर का होता है, ऐसा प्रेम हुए बिना ज्ञान होना संभव नहीं है|गरीब ऐसा सतगुरु सेईये, बेग उधारे हंस |भौसागर आवे नहीं, जौरा काल बिधिवंश || ९८ ||अर्थ---महाराज जी कह रहे हैं कि ऐसे सद्गुरु कि सेवा व उपासना करनी चाहिए जो तुरंत जीवात्मा का उद्धार कर दे, वो फिर इस संसार सागर में न आवे, अर्थात जन्म-मरण से रहित करके काल एवं मृत्यु को नष्ट कर देते हैं|गरीब पट्टन नगरी धर करै, गगन मण्डल गैनार |अलल पंख ज्यूं संचरै, सतगुरु अधम उधार ||९९ ||अर्थ—अलल पक्षी (अनल पक्षी) वायु में विचरण करने वाला पक्षी , अनल नाम वायु का है उस में विचरण करने के कारन उसे अनल पक्षी भी कहा जाता है| वह आकाश मंडल के शिखर परविचरण करता है| उसी प्रकार सद्गुरु महाराज जी भी नीच अधम जीवों का उद्धार करने के लिए गगन मंडल अर्थात सतलोक से आते है, और लौट कर वहीं चले जाते हैं | उसी प्रकार -----अलल पंख अनुराग है, सुन्न मण्डल रहे थीर |दास गरीब उधारिया, सतगुरु मिले कबीर || १०० ||अर्थ—सद्गुरु जी का उसी प्रकार का प्रेम अपने प्रेमी हंसों (भक्तों) से है जैसे अलल पक्षी अपने बच्चों से प्रेम रखता है| (अलल पक्षी का वर्णन इसी अंग कि दूसरी साखी में किया जा चुका है) वह आकाश मंडल में स्थिर रहते हुए भी अपने सुरति बल से अपने बच्चों को अपने पास खींच लेता है| गरीब दास जी महाराज कह रहे हैं कि उसी प्रकार से सद्गुरु कबीर साहेबजी ने अपने निज स्वरूप का बोध करवा कर, मेरा उद्धार कर दिया |~~~~~~~~~~~~~

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