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Sunday, 19 October 2014

Kabir saheb ke dohe

सन्त सिरोमणि कबीरदास जी की वाणीपुत्र की मोह में जन्म गंवाये ,ताते कबहुँ न छुटन पाये !ताकि मोह भयो जीव अँधा ,चला अन्त को यमपुर बँधा !पुत्र से कहो कौन सुख पाया ,शूल गड़े जड़ मूल नसाया ! आग जो लगी समंद में, धुंआ न परगट होए ।सो जाने जो जरमुआ जाकी लगी होए ॥आपा तजे हरि भजे, नख सिख तजे विकार ।सब जीवन से निर्भैर रहे, साधू मता है सार ॥एसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय ।औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप ।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥बाहर क्या दिखलाए, अनन्तर जपिए राम ।कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर ।पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥भगती बिगाड़ी कामियाँ, इन्द्री करे सवादी ।हीरा खोया हाथ थाई, जनम गंवाया बाड़ी ॥ बोली तो अनमोल है, जो कोई जाने बोल ।हृदय तराजू तोल के, तब मुख बहार खोल ॥बाहर क्या दिखलाए, अनन्तर जपिए राम ।कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ॥

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