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Sunday, 19 October 2014

Dadu satya ram

॥ दादूराम सत्यराम ॥दादू हँस मोती चुगैं, मानसरोवर न्हाइ ।फिर फिर बैसे बापुड़ा, काग करँकाँ आई ॥ ९ ॥सँत - हँस तो सत्संग - मानसरोवर में अविद्या - मल की निवृत्ति रूप स्नानकरके ब्रह्मानन्द रूप मोती चुगते हैं और बेचारे कामी प्राणी रूप कौए; नारी के शरीर रूप पँजर पर ही बारँबार आकर बैठते हैं ।दादू हँसा परखिये, उत्तम करणी चाल ।बगुा बैसे ध्यान धर, प्रत्यक्ष कहिये काल ॥ १० ॥सँत और हँस सार ग्रहण रूप श्रेष्ठ कर्त्तव्य से ही पहचाने जाते हैं, भेषादि से नहीं । हँस के समान श्वेत होने पर भी बक जब ध्यान धरके बैठता है, तब प्रत्यक्ष ही मच्छियों का काल कहा जाता है । वैसे ही सँतों का भेष धारण करने वाले कपटी बक - ध्यानी भी घातक

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