गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, तुरिया केरे तीर ।भगल विद्या वाणी कहे, छाने नीर अरु खीर ।। १९ ।।अर्थ---आचार्य जी कहते हैं की हमें ऐसे सद्गुरु जी मिले, तुरिया अवस्था ( अवस्था चार है, 1.जागृत, 2. स्वप्न, 3. सुषुप्ति, 4. तुरिया आत्मज्ञानी संतो को गुरु कृपा से प्राप्त होती हैं ) के समीप उन्होंने पहुंचा दिया ।ऐसी भगल विधा ( ब्रम्ह विधा ) रुपी वाणी कही, दूध पानी को अलग कर दिया ।अर्थात इस संसार को असार (मिथ्या) बताकर आत्म को ब्रम्ह रूप करके समझा दिया ।गरीब जिन्दा जोगी जगतगुरु,मालिक मुर्शिद पीव ।काल कर्म लागे नहीं, नहीं शंका नहीं सीव ।। २० ।।अर्थ---वह सदगुरुदेव (ज़िंदा जोगी) कबीर साहेब जगत के गुरु मालिक (स्वामी) पीव ( पति, परमात्मा ) मुरशद पीर (गुरु) हैं , उनके ऊपर काल और कम का कोई असर नहीं होता , इसमें कोई शंका नहीं हैं । नाही सीव (उत्तर ) समाधान हैं एवं कोई शंका समाधान की भी आवश्यकता नहीं है, यह अटल सिद्धांत हैं ।गरीब जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक मुरशद पीर ।दहूँ दीन झगड़ा मंड्या, पाया नहीं शरीर ।। २१ ।।अर्थ---काशी में जो भी मरता हैं चाहे वह महापापी ही क्यों ना हो उसकी मुक्ति होती हैं और जो मगहर (कर्म नाशा नदी के पास ) में मरता हैं वह चाहे ब्रम्ह ग्यानी महापुरुष ही क्यों ना हो , उसकी मुक्ति नहीं होती औरवो नरक में जाते हैं । लोगो की इस गलत धारणा को मिथ्या सिद्ध करने के लिए कबीर साहेब जी मगहर में गए । वे वहाँ अपना शरीर त्यागना चाहते थे तोउनके दोनों सम्प्रदाय ( हिन्दू,मुसलमान ) आपस में विवाद करने लगे । हिन्दू उनका दाह संस्कार करना चाहते थे और मुसलमान उनकी कब्र बनाना चाहते थे । जब दोनों सम्प्रदाय युद्ध के लिए तैयार हो गए तो कबीर साहेब जी ने उन्हें समझाया . और कहा की हम साधारण सांसारिक मनुष्यों की तरह नहीं मरेंगे एवं मैं चार दागों 1) अग्नि में जलाना 2) जमीन में दबाना3) जल में प्रवाहित करना 4) जंगल में रख देना- (जिसको जानवर खा जाए) में नहीं आउंगा । दोनों से दो चद्दर लेकर और फूल लेकर 1 चद्दर नीचे बिछाई और फूल भी बिछवाये, दूसरी चद्दर को ऊपर लेकर लेट गए । थोड़ी देर बाद जब देखा गया तो कबीर साहेब जी का शरीर उन चद्दरो में नहीं मिला । दोनों सम्प्रदाय के लोगो ने एक एक चद्दर और आधे आधे फूल ले लिए । मुसलमानों ने तो मगहर में कब्र बनवा दी और हिन्दुओ ने वो चद्दर काशी जी में लाकर वह कबीर चौरा बनवा दिया । इस कथा का वर्णन सद्गुरु जी ने वाणी (पारख का अंग ) में किया हैं ।गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, मालिक मुरशद पीर ।मार्या भलका भेद से , लगे ज्ञान के तीर ।। २२ ।।अर्थ---पहले चरम का अर्थ पूर्ववत समझे,बाकी तीन चरणों का अर्थ नीचे दियाहैं ।ऐसे फन वाला तीर मारा हैं जो लक्ष्य को बेधन कर गया । अर्थात ज्ञान उपदेश रुपी तीर मारकर अपने स्वरूप से भूले हुए जीव को स्व स्वरूप का ज्ञान करा दिया ।गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, तेज पुंज के अंग ।झिलमिल नूर जहूर हैं , रूप रेख नहीं रंग ।। २३ ।।अर्थ---सद्गुरु जी ऐसे हैं जिनके शरीर के अंग तेज (प्रकाश) पुंज (समूह)एवं तेजोमय हैं । उनके अंगो में से मिश्रित प्रकाश की विचित्र झिलमिलाहटप्रगट हो रही हैं जिससे उसे कोई एक रूप,एक रंग और एक चिन्ह का नहीं कह सकता , अर्थात वह सर्वरूप, सर्वरंग, सर्वत्र सर्व में व्यापक हैं और सबसेविलक्षण हैं ।गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, तेज पुंज की लोय ।तन मन अरपुं सीस कूँ , होनी होय सु होय ।। २४ ।।अर्थ---वह सद्गुरु कैसे हैं ? जो प्रकाश के समूह हैं, जिनका तेज समूह देदीप्यमान हो रहा हैं । महाराज जी कहते हैं कि ऐसे परम पुरुष सदगुरुदेवपरमेश्वर रूप के ऊपर हम अपना तन मन धन सर्वस्व अर्पण करते हैं । चाहे कुछ भी हो हम पीछे नहीं हटेंगे, सब कुछ वार देंगे एवं न्योछावर कर देंगे।
Sunday, 19 October 2014
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Garib dass mahraaj ji ki vaani
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