गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, मारी ग्यासी गेन ।रोम-रोम में सालती पलक नहीं हैं चैन || २७ ||अर्थ---महाराज जी कहते हैं की ऐसी ग्यासी (एक छोटा मोडदार हथियार ) मारी जिसके द्वारा शत्रु के पेट की अंतडियां खींच ली जाती हैं | अर्थात सद्गुरु जी ने उपदेश रुपी ग्यासी ( ज्ञान शस्त्र ) जिज्ञासु को ऐसी मारी की जिसके लगने से गेन (ऐन) ठीक-ठीक ह्रदय घायल कर दिया व सद्गुरु को प्राप्त करने के लिए तड़फ उठा | रोम-रोम में बैचैनी पैदा हो गई | विरहकी व्यथा (पीड़ा) सताने लगी | एक पल के लिए भी आराम नहीं मिल रहा है, सद्गुरु के वियोगी को बिना सद्गुरु आराम कैसे मिल सकता हैं |गरीब सतगुरु भालका खेंचकर,लाया बाण जू एक |स्वास उभारे सालता पड्या कलेजे छेक ||२८||अर्थ---महाराज जी कहते हैं की सद्गुरु जी ने फन (लोहे की मुखि वाला ) शब्द रुपी बाण खींचकर मारा कि उस बाण के लगने से दिल में विरह – वियोग( तडफन ) उत्पन्न हो गई | अर्थात विरह उत्पन्न होकर दुःख देने लगा | जिससे कि लंबे लंबे स्वास उभर आये और स्वासों के साथ अजपा – जाप भी होने लगा | ह्रदय में हर समय तडफ रहने लगी जिससे ब्रम्ह प्राप्ति का अनुभव हो गया |गरीब सद्गुरु मार्या बाण कस, खैबर ग्यासी खैंच |भर्म कर्म सब जर गए, लई कुबुद्धि सब एंच ||२९||अर्थ---खैबर और ग्यासी ( एक प्रकार का लोहे का अस्त्र जो मोडदार और कांटेदार होता हैं ) जो पहले के समय में लड़ाई (युद्ध) के काम में आते थे | सद्गुरु जी ने शब्द स्वरूपि उपदेश विरह से भरा हुआ बाण कसकर मारा |इन शब्द रुपी अस्त्रों के लगने से (ज्ञान अग्नि उत्पन्न हुई) उसने हमारे सभी भर्म कर्म रुपी दोषों को जला दिया | कुबुद्धि अज्ञान आदि दुर्गुणों को एंच= खींचकर दूर फेंक दिया |गरीब सद्गुरु आये दया करि, ऐसे दीनदयाल |बंदी छोड़ बिरद तास का , जठर अग्नि प्रतिपाल ||३०||अर्थ---महाराज जी कहते हैं कि इष्ट देव सद्गुरु जी हमारे ऊपर दया करके आये जो कि बड़े ही दीनदयाल हैं और दीन दुखियों पर दया करने वाले हैं | बंध छुडाने अर्थात बंधनों से मुक्त कराने वाले हैं यह तो उनका विरद (स्वभाव ) ही हैं | उन्होंने हमें माता के गर्भ की जठराग्नि ( जो अन्न आदि को पचाती हैं ) से रक्षा की | सद्गुरु ऐसे दीनदयाल हैं कि जब माता के पेट में हम थे तो जठराग्नि (उदराग्नि) के द्वारा तापक्रम ठीक रखके रक्षा कर हमारी पालना की |गरीब जठर अग्नि से राखिया , प्याला अमृत खीर |जुगन जुगन सत्संग है, समझ कुटन वे पीर ||३१||अर्थ---सद्गुरु जी ने माता के गर्भ में जठराग्नि के ताप से हमें बचाया और ज्ञान रुपी अमृत रस पिलाया जिससे पूर्ण तृप्ति एवं शान्ति हो गई, अथवा अमृत स्वरूप दूध पिलाया | अरे वे पीर (बिना गुरु,मनमुख, गुरु विमुख) तू उस समरथ सद्गुरु साहेब को समझ, जिसने तुझे अमृत पिला करके नौ महीने माता के गर्भ में तेरी रक्षा की और युग युगान्तरों से हर समय वह सतपुरुष तेरे अंग संग रहते हैं | अर्थात हर समय हर जगह व्यापक हैं |गरीब जूनी संकट मेट है, औंधे मुख नहीं आय |ऐसा सद्गुरु सेइये, जम से लेत छुडाय ||३२||अर्थ---सद्गुरु जी कहते हैं की हे जीव तू उस परमपिता परमेश्वर गुरुदेव की शरण में जा, जो तेरा चौरासी लाख जूनीओं का संकट मेट दे ।फिर तू औंधे मुख- उल्टा मुख ( नीचे को सिर , ऊपर को पैर) करके माता के गर्भ में नहींआएगा । साथ ही वो सद्गुरु तुझे ब्रम्हज्ञान देकर निर्भय कर देंगे और यमदूतो से छुड़ा लेंगे । जब तू उनकी शरण में जाकर उनकी सेवा करेगा तो गुरुदेव महाराज तुझे जनम-मरण के चक्र से निकाल देंगे क्योंकि ---गरीब जैम जौरा जासे डरे, धर्मराय के दूत।चौदा कोटि न चंप ही, सुन सद्गुरु की कूत ।।३३।।अर्थ---यम राज और जौरा (धर्मराय की पत्नी) अर्थात मृत्यु यम सेना उससे (सद्गुरु से) डरते हैं या यमराज के दूत ( जिनकी संख्या चौदह करोड है) वह भी सद्गुरु की कूत (शक्ति) को सुनकर डरते हुए सद्गुरु के उपासक के पास नहीं (चम्प) फटकते एवं पास में नहीं आते | सेवकों ने पूछा महाराज ऐसा समरथ गुरु कौन से हैं ?उत्तर ---गरीब यम जौरा जासे डरे, धर्मराय धर धीर ।ऐसा सद्गुरु एक है, अदली अदल कबीर ।।३४।।अर्थ---महाराज जी कहते हैं की जिससे यम और उसकी पत्नी मृत्यु या उसकी सेना भी डरती हैं और धर्मराय जो धीरज को धारण करने वाला हैं वह भी सद्गुरु जी से डरता हैं कि मैंने कहीं गुरुमुख व्यक्ति को कष्ट दिया तो मेरी भी खैर नहीं । जिससे धर्मराय आदि सब डरते हैं ऐसा तो केवल एकमात्र निष्पक्ष न्याय कर्ता अदल (न्याय) स्वरूप सद्गुरु कबीर साहेब ही हैं ।गरीब जैम जौरा जासे डरे, मिटे कर्म के अंक ।कागज़ कीरे द्रगह दइ, चौदह कोटि न चम्प ।।३५।।अर्थ---महाराज जी कह रहे हैं की ऐसे सद्गुरु कबीर साहेब से और उनके नाम से यमराज डरते हैं क्योकि सद्गुरु शिष्यों के कर्म के अंक=लेख (कर्मफल) भी मेट देते हैं । जो चित्रगुप्त के कागज-पत्रों में लिखे हुएहैं ।शुभ-अशुभ उन कर्मो के हिसाब के कागज़ पत्रों के लेखो को सद्गुरु जी स्वयंकीरै (फाड़) देते हैं और अपने न्याय दरबार में चौदह करोड़ यमराज सेना को फटकने भी नहीं देते अर्थात वह सद्गुरु उपासकों के समीप भी नहीं जा सकते ।गरीब जैम जौरा जा से डरे, मिटे कर्म के लेख।अदली अदल कबीर हैं कुल के सद्गुरु ऐक ।।३६।।अर्थ---जिससे अपनी मृत्यु रुपी पत्नी सहित धर्म राज भी डरते हैं जो शरणागत शिष्यों के कर्म एवं कर्मफल के लेख मिटा देते हैं । वह न्यायकर्ता न्याय स्वरूप कबीर साहेब ही हैं । कुल के=सबके हिन्दू मुसलमान के एक सद्गुरु हैं । उनका उपदेश मानव मात्र के लिए हितकर हैं । इसलिए वो सबके सद्गुरु कबीर साहेब ही हैं ।गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, पहुंच्या मंझ निधान ।नौका नाम चढ़ाय कर, पार किये प्रवान ।।३७।।अर्थ---गरीब दास जी महाराज कह रहे हैं की हमें ऐसे सद्गुरु मिले कि जब हम भवसागर में डूब रहे थे तब उसके बीच में से हमें डूबते हुओ को उबारने के लिए सद्गुरु जी खेवट (मल्लाह) बनकर पहुँच गए । निदान (फल) यह हुआ कीहमको ईश्वर नाम की नौका पर चढाकर संसार से पार करा दिया। यहाँ परवान (प्रमाणित) बात हैं या परवान शिष्य के पराधीन वशीभूत होना उनका स्वभाव हैं ।गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, भवसागर के माहिं ।नौका नाम चढ़ाय कर, ले राखे निज ठाहीं ।।३८।।अर्थ---हमको ऐसे सद्गुरु मिली कि जो भौ = भव (संसार) सागर के बीच में सहारा देने के लिए आये । नाम रुपी नौका पर चढाकर संसार सागर से पार अपनेनिज स्थान मुक्ति लोक में अर्थात सत्य लोक में ले जाकर ठहरा दिया । अर्थात हमें अपने स्वरूप में स्थित कर जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए छुड़ा दिया ।गरीब ऐसा सद्गुरु हम मिल्या, भव सागर के बीच ।खेवट सब कूँ खेवता , क्या उत्तम क्या नीच ।।३९।।अर्थ---सद्गुरु जी हमें संसार सागर (समुद्र) से पार करने के लिए मिले , वह नाम रुपी नौका में बिठाकर उसे पार कराते है, क्योकि खेवट (मल्लाह) सबको एक द्रष्टि से देखता हैं । ऊँच - नीच का भेदभाव नहीं रखता । जो भी कोई नदी पार करने के लिए नौका में बैठता हैं उसे पार करा देता हैं । इसीप्रकार सद्गुरु जी भी शरण में आये हुए जीवों का कल्याण करने के लिए किसीप्रकार का भेद भाव नहीं रखते , उत्तम (ऊँच) नीच सबको ज्ञान उपदेश देकर भव-सागर से पार करा देते हैं ।
Sunday, 19 October 2014
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sabad kabir ji ka
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