सत भगति और परमात्मा
कबीर, ऐसे सुख के माथे पत्थर पड़ेँ ,
जो नाम ह्रदय से जाये ।
बलिहारी उस दुःख नूँ ,
जो पल पल नाम रटायेँ ।।
कबीर, क्या माँगू कुछ ना स्थिर रहाईँ ,
देखत नैन चला सब जग जाईँ ।।
गरीब मात पिता सुत बाँधवा, क्यों देख
भुलाना रे ।
इन मैं तेरा कोईं नहीं क्यो भया दिवाना रे ।।"
न्यारे न्यारे कर्म है न्यारी न्यारी जात !!
कोय किसी का है नहीं ये झूटा संगी साथ !!
रिण सम्बन्द जुरे है,मात पिता भाय !
गरिह द्वार और स्त्रि ,आप आप को जात !
मात पिता मिल जयेन्गे लख चौरसी मही !
सत्गुरु सेव और बन्दगी फिर मिलन कि नही !
प्रभु (कबीर) मेरा कोई नहीं !! हम काहू के
नाहिं !!
पारै(सतलोक) पहुंची नाव ज्यों !! मिलि कै
बिछुरी जाहिं !!
गुरूजी तुम ना भूलियो चाहे लाख लोग मिल
जाहिं.
हमसे तुमको बहुत हैं, पर तुमसे
हमको नाहिं..... ...गुरु देव रामपाल जी महाराज
कि जय हो ! सत् साहेब !"
कबीर,पढ़े पुराण और वेद बखाने ,
सतपुरुष जग भेद ना जाने ।
वेद पढ़े और भेद न जाने ,
नाहक यह जग झगड़ा ठाने।।
वेद पुराण यह करे पुकारा ।
सबही से इक पुरुष निरारा,
तत्वदृष्टा को खोजो भाई ,
पूर्ण मोक्ष ताहि तैँ पाई ।।
कःविः नाम जो बेदन मेँ गावा ,
कबीरन् कुरान कह समझावा ।
वाही नाम है सबन का सारा, आदि नाम वाही कबीर
हमारा ।
कबीर ,जीवित मृतक होये रहो, तजो खलक की आस ।
रक्षक समर्थ सतगुरु , ना दुःख पावे दास ।।
कबीर, राम नाम रटते रहो जब लग घट मेँ प्राण ,
कबहू तो भनक पड़ेगी,
दीन दयाल के कान ।।
कबीर , गहै नाम सेवा करै ,
सतनाम गुण गावै ।
सतगुरु पद विश्वास दृढ़ ,
सहज परम पद पावै ।।
कबीर,साथी हमारे चले गऐ हम भी चालन हार ,
कोऐ कागज बाकी रह रही ताते लागरी वार ।।
कबीर, राम बुलावा भेजया दिया कबीरा रोये ।
जो सुख है सतसंग वो बेकूँठ(स्वर्ग) भी ना ।
कबीर,पढ़े पुराण और वेद बखाने ,
सतपुरुष जग भेद ना जाने ।
वेद पढ़े और भेद न जाने ,
नाहक यह जग झगड़ा ठाने।।
वेद पुराण यह करे पुकारा ।
सबही से इक पुरुष निरारा,
तत्वदृष्टा को खोजो भाई ,
पूर्ण मोक्ष ताहि तैँ पाई ।।
कःविः नाम जो बेदन मेँ गावा ,
कबीरन् कुरान कह समझावा ।
वाही नाम है सबन का सारा, आदि नाम वाही कबीर
हमारा ।।
कबीर , सतगुरु के द्वारबार मेँ कमी काहे
की नाहीँ ।
हँसा मौज ना पावता तेरी चूक चाकरी माही ।।
कबीर,टोटे मेँ भगति करेँ सोये सही सपूत ,
ये धारी मस्करे ना जाने कितने जा लिऐ ऊत ।।
कबीर,साँई योँ मति जानियोँ, प्रीति घटै मम
चित्त ।
मंरु तो तुम सुमिरत मरुं ,
जीवत समरुँ नित्य ।।
गरीब, पूर्ण ब्रह्म कृपा निधान,सुन केशव करतार ।
गरीबदास मुझ दीन की ,
रखियो बहुत संभार ।।
कबीर,सहकामी भक्ति करै ,पावै उत्तम धाम ।
निहकामी भक्ति करै तो ,पावै निश्चल ठाम ।।
गरीब,निह इच्छा जो देत हैँ,
सोई दान कहावै ।
फल बाचै नहीँ तास का ,
मुक्ति पदार्थ पावै ।।
गरीब,निह इच्छा जो देत हैँ,
सोई दान कहावै ।
फल बाचै नहीँ तास का ,
मुक्ति पदार्थ पावै ।।
गरीब , गगन मण्डल गादी जहाँ , पार ब्रह्म
अस्थान ।
सुन्न शिखर के महल मेँ ,
हंस करैँ विश्राम ।।
गरीब ,जम जौरा जासे डरैँ ,मिटेँ कर्म के लेख ।
अदली असल कबीर हैँ , कुल के सतगुरु एक ।।
गरीब,ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,है जिँदा जगदीश ।
सुन्न विदेशी मिल गया , छत्र मुकुट है शीश ।।
कबीर ,दुख मेँ सुमिरन सब करेँ ,
सुख मे करे ना कोय ।
सुख मे सुमिरन करे तो दुख काहे को होय ।
कबीर ,जीवित मृतक होये रहो, तजो खलक की आस ।
रक्षक समर्थ सतगुरु ,ना दुःख पावे दास ।।
" कबीर, सुमिरण से सुख होत है ,
सुमिरण से दुःख जाए ।
कहै कबीर जो सुमिरण करे साँई माही समाए ।।"
सतगुरु बन्दीँ छोड़ स्वरुप है
रब दा ।
जो कुल मालिक है जी सब दा ।।
जहां संखो लहर मेहर की उपजैँ,
कहर जहां नहीं कोई ।
दासगरीब अचल अविनाशी,
सुख का सागर सोई ।।
।। सत साहिब ।।
सतगुरु दाता हैँ कलि माहिँ ,
प्राण उधारण उतरे सांई ।
सतगुरु दाता दीन दयालं,
जम किँकर के तोड़ेँ जालं ।।
>सत साहिब<
कबीर, कहते को कह जान देँ , गुरु की सिख तू लेय
।
साकट( दुष्ट) और सावान(कुत्ता) को उल्ट जवाब
ना देय ।।
कबीर, सोया तो निष्फल गया , जोगो सो फल लेय ।
साहिब हक्क न राखसी ,
जब माँगै तब देय ।।
कबीर,संगत मे कुसंगत उपजेँ ,
जैसे बणखण्ड मेँ बाँस ।
आपा घिसघिस आग लगादेँ,
करे बणखण्ड का भी नाश ।।
सतगुरु बन्दीँ छोड़ स्वरुप है
रब दा ।
जो कुल मालिक है जी सब दा ।।
कबीर ,जो तोको काँटा बोयै ,वाकौ बौ तू फूल ।
तौहे फूल के फूल है , वाकौ है त्रिशूल ।
कबीर,जो जन मेरी शारन है , ताका हुँ मेँ दास ।
गेल गेल लाग्या फिरु चाहे धरती हो चाहे आकाश
।
कबीर, कहते को कह जान देँ , गुरु की सिख तू लेय
।
साकट( दुष्ट) और सावान(कुत्ता) को उल्ट जवाब
ना देय ।।
कबीर, सत ना छोड़े सुरमा, सत छोड़े पत जा।
सत के बान्दी लक्ष्मी फेर मिलेगी आ ।
Jin moko nij naam dai, Sadguru soi humaar Dadu
doosar kaun hai, Kabir sirjan haar ।
कबीर,औगुन किया तो बहु किया ,करत न मानी हार
।
भावै बंदा बखशियो ,
भावै गरदन तार ।
कबीर, औगुन मेरे बापजी ,
बखशोँ गरीब निवाज ,
जो मैँ पूत कपूक हूँ ,बहुर पिता को लाज ।।
कबीर,मैँ अपराधी जन्मका ,
नख शिख भरे बिकार ,
तुम दाता दुख भंजना ,
मेरी करो संभार ।।कबीर , द्वार धन्नी के
पड़ा रहे , धक्केँ धन्नी के खाय ।
लाख बार काल झकझोँर ही,द्वार छोड़ कर ना जाय
।
**** साहेब कबीर की वाणी से गुरूदेव का अंग
****
कबीर, दण्डवत् गोविन्द गुरु, बन्दूँ अविजन सोय।
पहले भये प्रणाम तिन, नमो जो आगे होय ।।1।।
कबीर, गुरुको कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परनाम।
कीट न जानै भृंग को, यों गुरुकरि आप समान ।।
2।।
कबीर, गुरु गोविंद कर जानिये, रहिये शब्द समाय।
मिलै तौ दण्डवत् बन्दगी, नहिं पलपल ध्यान लगाय
।।3।।
कबीर, गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसके
लागों पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया मिलाय ।।4।।
कबीर, सतगुरु के उपदेशका, सुनिया एक बिचार।
जो सतगुरु मिलता नहीं, जाता यमके द्वार ।।5।।
कबीर, यम द्वारेमें दूत सब, करते खैंचा तानि।
उनते कभू न छूटता, फिरता चारों खानि ।।6।।
कबीर, चारि खानिमें भरमता, कबहुं न लगता पार।
सो फेरा सब मिटि गया, सतगुरुके उपकार ।।7।।
कबीर, सात समुन्द्र की मसि करूं, लेखनि करूं
बनिराय।
धरती का कागद करूं, गुरु गुण लिखा न जाय ।।8।।
कबीर, बलिहारी गुरु आपना, घरी घरी सौबार।
मानुषतें देवता किया, करत न लागी बार ।।9।।
कबीर, गुरुको मानुष जो गिनै, चरणामृतको पान।
ते नर नरकै जाहिगें, जन्म जन्म होय स्वान ।।10।।
कबीर, गुरु मानुष करिजानते, ते नर कहिये अंध।
होंय दुखी संसारमें, आगे यमका फंद ।।11।।
कबीर, ते नर अंध हैं, गुरुको कहते और।
हरिके रूठे ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर ।।12।।
कबीर, कबीरा हरिके रूठते, गुरुके शरने जाय।
कहै कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय ।।13।।
कबीर, गुरुसो ज्ञान जो लीजिये, सीस दीजिये
दान।
बहुतक भोंदू बहिगये, राखि जीव अभिमान ।।14।।
कबीर, गुरु समान दाता नहीं, जाचक शिष्य समान।
तीन लोककी सम्पदा, सो गुरु दीन्हीं दान ।।15।।
कबीर, तन मन दिया तो भला किया,
शिरका जासी भार।
जो कभू कहै मैं दिया, बहुत सहे शिर मार ।।16।।
कबीर, गुरु बड़े हैं गोविन्द से, मन में देख
विचार।
हरि सुमरे सो वारि हैं, गुरु सुमरे होय पार ।।
17।।
कबीर, ये तन विष की बेलड़ी, गुरु अमृत की खान।
शीश दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।18।।
कबीर, सात द्वीप नौ खण्ड में, गुरु से
बड़ा ना कोय।
करता करे ना कर सकै, गुरु करे सो होय ।।19।।
कबीर, राम कृष्ण से को बड़ा, तिन्हूं भी गुरु
कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरु आगै आधीन ।।20।।
कबीर, हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक।
तासु पटन्तर ना तुलैं, संतन किया विवेक ।।21।।
|| सत साहेब || —
रे भोली सी दुनीया सतगुरु बीन केसे सरीया ।
अपने लला के बाल उतरवाये देखे केची न
लगजाया ।
एक बकरी का बच्चा लेके उसका गला कटया । रे
भोली सी दुनीया सतगुरु बीन कासे सरीया ।
काचा पाका भोजन बनावे माता धोक
चठाया माता उपर कुता मुते वही माता न
मरझाइया ।। रे भोली सी दुनीया सतगुरु बीन केसे
सरीया।।"
मन नेकि कर लै दौ दिन का मेहमान,
जोरू लडका कुटुम कबिला दो दिन हे तन मन
का मैला,अ'त काल ऊठ चले अकैला तज
माया मङान ,
मन नेकि कर लै दौ दिन का मेहमान,
कोन तुमहारा सचचा सा'ई झुठि हे सब सकल
सगाई,चलने से सै पहलै सोच लै भाई कहा करोगे
विसराम, मन नेकि कर लै दौ दिन
का मेहमान ,कहा से आया कहा जायेगा अ'त समय
कहा समावैगा , आखिर तुझ कोन कहेगा गुरू बिन
आतम गयान,मन नेकि कर लै दौ दिन का मेहमान,
हरहठ माल पनघट जयो भरिता आवत जावत भरै और
रिता,जुगन जुगन तु मरता जिता, करवालै रै
कलयान,मन नेकि कर लै दौ दिन का मेहमान ,
लख चोरासी कि सहै तिराषा, ऊच निच घर
लैता वासा कहै ,कबिर सब मिटाऊ रासा कर
मैरि पहचान ,मन नेकि कर लै दौ दिन का मेहमान,.
मन नेकि कर लै दौ दिन का मेहमान ,.
Tuesday, 3 March 2015
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About Sobh Nath
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