Shuksham Ved se-
84 क्यों बनी ?
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! मैंने चारों खानि के लक्षण तुमसे कहे।अब सुनो । मनुष्य योनि की अवधि समाप्त होने से पहले किसी कारण से देह छूट जाय । वह फ़िर से संसार में मनुष्य जन्म लेता है । अब उसके बारे में सुनो ।तब धर्मदास बोले -हे साहिब ! मेरे मन में एक संशय उठा है । वह मुझे समझाईये । जब 84 लाख योनियों में भरमने भटकने के बाद ये जीव मनुष्य देह पाता है । और मनुष्य देह पाया हुआ ये जीव फ़िर देह ( असमय ) छूटने पर पुनः मनुष्य देह पाता है । तो मृत्यु होने और पुनः मनुष्य देह पाने की यह संधि कैसे हुयी ? यह विधि मुझे समझाईये । और उस पुनः मनुष्य जन्म लेने वाले मनुष्य के गुण लक्षण भी कहो ।कबीर साहब बोले -हे धर्मदास ! सुनो । आयु शेष रहते जो मनुष्य मर जाता है । फ़िर वह शेष बची आयु को पूरा करने हेतु मनुष्य शरीर धारण करके आता है । जो अग्यानी मूर्ख फ़िर भी इस पर विश्वास न करे । वह दीपक बत्ती जलाकर देखे । और बहुत प्रकार से उस दीपक में तेल भरे । परन्तु वायु का झोंका ( मृत्यु आघात ) लगते ही वह दीपक बुझ जाता है ( भले ही उसमें खूब तेल भरा हो ) उसे बुझे दीपक को आग से फ़िर जलायें । तो वह दीपक फ़िर से जल जाता है । इसी प्रकार जीव मनुष्य फ़िर से देह धारण करता है ।हे धनी धर्मदास ! अब उस मनुष्य के लक्षण भी सुनो । उसका भेद तुमसे नही छुपाऊँगा । मनुष्य से फ़िर मनुष्य का शरीर पाने वाला वह मनुष्य शूरवीर होता है । भय और डर उसके पास भी नहीं फ़टकता । मोह माया ममताउसे नहीं व्यापते । उसे देखकर दुश्मन डर से कांपते हैं । वह सतगुरु के सत्य शब्द को विश्वास पूर्वक मानता है । निंदा को वह जानता तक नहीं है । वह सदा सदगुरु के श्रीचरणों में अपना मन लगाता है । और सबसे प्रेममयी वाणी बोलता है । अग्यानी होकर ( जानते हुये भी ) ग्यान को पूछता समझता है । उसे सत्यनाम का ग्यान और परिचय करना बेहदअच्छा लगता है ।हे धर्मदास ! ऐसे लक्षणों से युक्त मनुष्य से ग्यान वार्ता करने का अवसर कभी खोना नहीं चाहिये ।और अवसर मिलते ही उससे ग्यान चर्चा करनीचाहिये । जो जीव सदगुरु के शब्द ( नाम या महामंत्र ) रूपी उपदेश को पाता है । और भली प्रकार गृहण करता है । उसके जन्म जन्म का पाप और अग्यान रूपी मैल छूट जाता है । सत्यनाम का प्रेमभाव से सुमरन करने वाला जीव भयानक काल माया के फ़ंदे से छूटकर सत्यलोक जाता है । सदगुरु के शब्द उपदेश को ह्रदय में धारण करने वाला जीव अमृतमय अनमोलहोता है । वह सत्यनाम साधना के बल पर अपने असली घर अमरलोक ( या सत्यलोक एक ही बात है ) चला जाता है । जहाँ सदगुरु के हँस जीव सदा आनन्द करते हैं । और अमृत का आहार करते हैं । जबकि काल निरंजन के जीव कागदशा ( विष्ठा मल के समान घृणित वासनाओं के लालची ) में भटकतेहुये जन्म मरण के काल झूले में झूलते रहते हैं ।सत्यनाम के प्रताप से काल निरंजन जीव को सत्यलोक जाने से नहीं रोकता। क्योंकि महाबली काल निरंजन केवल इसी से भयभीत रहता है । उस जीव परसदगुरु के वंश की छाप ( दीक्षा के समय लगने वाली नाम मोहर ) देखकर काल बेबशी से सिर झुकाकर रह जाता है ।तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! आपने चार खानि के जो विचार कहे । वो मैंने सुने । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि 84 लाख योनियों की यह धारा का विस्तार किस कारण से किया गया । और इस अविनाशी जीव को अनगिनत कष्टों में डाल दिया गया । मनुष्य के कारण ही यह सृष्टि बनायी गयी है । या कि कोई और जीव को भी भोग भुगतने के लिये बनायी गयी है ?कबीर साहब बोले -हे धर्मदास ! सभी योनियों में श्रेष्ठ यह मनुष्य देह सुख को देने वाली है । इस मनुष्य देह में ही गुरु ग्यान समाता है । जिसको प्राप्त कर मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है । ऐसा मनुष्य सरीर पाकर जीव जहाँ भी जाता है । सदगुरु की भक्ति के बिना दुख ही पाता है ।मनुष्य देह को पाने केलिये जीव को 84 के भयानक महाजाल से गुजरनाही होता है । फ़िर भी यह देह पाकर मनुष्य अग्यान और पाप में ही लगा रहता है । तो उसका घोर पतन निश्चित है । उसे फ़िर से भयंकर कष्टदायकसाढे 12 लाख साल की 84 धारा से गुजरना होगा । दर बदर भटकना होगा ।सत्य ग्यान के बिना मनुष्य तुच्छ विषय भोगों के पीछे भागता हुआ अपनाजीवन बिना परमार्थ के ही नष्ट कर लेता है । ऐसे जीव का कल्याण किस तरह हो सकता है ? उसे मोक्ष भला कैसे मिलेगा ? अतः इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सतगुरु की तलाश और उनकी सेवा भक्ति अति आवश्यकहै ।हे धर्मदास ! मनुष्य के भोग उद्देश्य से 84 धारा या 84 लाख योनियाँ रची गयीं हैं । सांसारिक माया और मन इन्द्रियों के विषयों के मोह में पङकर मनुष्य की बुद्धि ( विवेक ) का नाश हो जाता है । वहमूढ अग्यानी ही हो जाता है । और वह सदगुरु के शब्द उपदेश को नहीं सुनता । तो वह मनुष्य 84 को नहीं छोङ पाता ।उस अग्यानी जीव को भयंकर
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