।। ऊँ-तत्-सत् का विस्तृत वर्णन।।
पुण्यशाली आदरणीय भगत आत्माओं मैं
आपजी के समक्ष अपने सदगुरु तत्वदर्शी संत
रामपाल जी महाराज जी की असीम
प्रेरणा से प्राप्त ॐ तत सत मन्त्र
का विस्तृत
अर्थ नामक इस लेख को पोस्ट कर रहा हूँ ...
आपजी इसको पढ़े तथा वास्तविक आत्म
कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे ||
विशेष:- गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में
वर्णित तत्वदर्शी संत ही पूर्ण
परमात्मा के
तत्वज्ञान को सही बताता है, उन्हीं से
पूछो, मैं (गीता बोलने वाला प्रभु)
नहीं जानता। इसी का प्रमाण
गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तक भी है।
इसीलिए यहाँ गीता अध्याय 17 श्लोक
23
से 28 तक का भाव समझें। अध्याय 17 के
श्लोक 23 से 28 तक में कहा है कि पूर्ण
परमात्मा के पाने के ऊँ, तत्, सत् यह तीन
नाम
हैं। इस तीन नाम के जाप का प्रारम्भ
स्वांस
द्वारा ओं (ॐ) नाम से किया जाता है।
तत्वज्ञान के अभाव से स्वयं निष्कर्ष
निकाल
कर शास्त्रविधि सहित साधना करने वाले
ब्रह्म तक की साधना में प्रयोग मन्त्रों के
साथ ‘ऊँ‘ मन्त्र लगाते हैं। जैसे ‘ऊँ नमो भगवते
वासुदेवाय नमः‘, ‘ऊँ नम: शिवायः‘ आदि-
आदि। यह जाप (काल-ब्रह्म तक व उनके
आश्रित तीनों ब्रह्मा जी, विष्णु जी, शंकर
जी से लाभ लेने के लिए) स्वर्ग प्राप्ति तक
का है। फिर भी शास्त्र विधि रहित होने
से उपरोक्त मंत्र व्यर्थ हैं बेसक इन मंत्रों से
कुछ
लाभ भी प्राप्त हो।
तत् नाम का तात्पर्य है कि (अक्षर ब्रह्म)
परब्रह्म की साधना का सांकेतिक मन्त्र।
यह तत् मन्त्र है। वह पूर्ण गुरु से लेकर
जपा जाता है। स्वयं या अनाधिकारी से
प्राप्त करके जाप करना भी व्यर्थ है। यह
तत
(सतनाम ) मन्त्र इष्ट की प्राप्ति के लिए
विशेष मन्त्र है तथा सत् जाप मन्त्र पूर्ण
परमात्मा का है जो सारनाम के साथ
जोड़ा जाता है। उससे पूर्ण मुक्ति होती है।
सतशब्द अविनाशी का प्रतीक है। प्रत्येक
इष्ट की प्राप्ति के लिए भी "तत" शब्द है
तथा सतशब्द अविनाशी का प्रतीक है। वह
सारनाम है।
लेकिन वेदों व शास्त्रों में न तत् नाम है और
न
ही सत मन्त्र है। केवल ऊँ नाम है। आदरणीय
गरीबदास साहेब जी (साहेब कबीर के
शिष्य) संत कहते हैं कि कबीर परमेश्वर ने
बताया कि यह सत नाम "तत " मंत्र मैं
ही इस
काल लोक में लाया हूँ तथा सतशब्द
(सारनाम) गुप्त रहा है, वह केवल
अधिकारी को ही दिया जाता है।
गरीब, सोहं शब्द हम जग में लाए। सार शब्द
हम
गुप्त छुपाए।।
यह सत शब्द (सारशब्द) पूर्ण गुरु ही दे
सकता है। अन्य जप, दान, यज्ञ
आदि श्रद्धा से व शास्त्रानुकूल किए जाएँ
तो उनका जो फल निहीत (कुछ समय स्वर्ग
प्राप्ति) है वह मिल जाएगा। यदि ऐसे
नहीं किए तो वह फल भी नहीं है। फिर
भी जब तक सारनाम (सत्शब्द)
नहीं मिला तो ओ3म तथा तत् मंत्र
(सांकेतिक) भी व्यर्थ हैं। कुछ साधक केवल
‘ऊँ-
तत्-सत्‘ इसी को मूल मन्त्र मान कर बार-
बार
अभ्यास करते हैं जो व्यर्थ है,
बिना श्रद्धा के
किया हुआ धार्मिक अनुष्ठान या जप न
तो इसी लोक में लाभदायक है तथा न मरने
के
बाद। इसलिए गुरु आज्ञानुसार पूर्ण
श्रद्धा भाव से आध्यात्मिक कर्म
लाभदायक हैं। भक्ति चाहे नीचे के प्रभुओं
की करो, चाहे पूर्ण परमात्मा सतलोक
प्राप्ति की करो, वह
साधना शास्त्रानुकूल तथा श्रद्धा पूर्वक
ही लाभदायक है। केवल " तत " शब्द तक
की साधना भी काल जाल तक है।
परमेश्वर कबीर (कविर्देव) जी की अमृत
वाणी:-
कबीर, जो जन होगा जौहरी, लेगा शब्द
विलगाय।
सोहं - सोहं जप मुए, व्यर्था जन्म गंवाए।।
कोटि नाम संसार में, उनसे मुक्ति न होए।
सारनाम मुक्ति का दाता, वाकुं जाने न
कोए।।
आदरणीय गरीबदास साहेब जी की अमृत
वाणी:-
गरीब, सोहं ऊपर और है, सतसुकृत एक नाम।
सब हंसों का बास है,
नहीं बस्ती नहीं गाम।।
सोहं में थे ध्रुव प्रहलादा, ओ3मसोहं वाद
विवादा।
नामा छिपा ओ3मतारी, पीछे सोहं भेद
विचारी।
सार शब्द पाया जद लोई, आवागवन बहुर न
होई।।
उपरोक्त अमृत वाणी में परमात्मा प्राप्त
महान आत्मा आदरणीय गरीबदास साहेब
जी कह रहे हैं कि जो केवल ओ3म व सोहं के
मंत्र
जाप तक सीमित है, वे भी काल के जाल में
ही हैं। जैसे पूर्ण परमात्मा कविर्देव
चारों युगों में आते हैं, तब पूर्ण विधि स्वयं
ही वर्णन करके जाते हैं। इसी पूर्ण
परमात्मा के नाम रहते हैं - सतयुग में
सतसुकृत
जी, त्रोतायुग में मुनिन्द्र जी, द्वापर युग
में
करूणामय जी तथा कलयुग में वास्तविक
कविर्देव नाम से ही प्रकट होते हैं। जब
पूर्ण
ब्रह्म कविर्देव सतयुग में सतसुकृत नाम से
आए थे
तो वास्तविक ज्ञान वर्णन करते थे।
जो उस
समय के ऋषियों द्वारा वर्णित ज्ञान के
विपरित (सत्य) ज्ञान था।
क्योंकि ऋषिजन वेदों को ठीक से न समझ
कर ओ3म मंत्र को पूर्ण ब्रह्म का मानकर
जाप
करते तथा कराते थे तथा ब्रह्म को पूर्ण
ब्रह्म
ही बताते थे।
पूर्ण परमात्मा कहा करते थे कि ब्रह्म से
ऊपर
परब्रह्म, उससे ऊपर पूर्ण ब्रह्म पूर्ण
शक्ति युक्त
प्रभु है। इस ज्
Saturday, 7 February 2015
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