गरीब, लख बर सूरा झूझ ही, लख बर सावत देह,
लख बर यति जहान मे, तब सतगुरु शरणा लेय।
सदगुरु बन्दी छोड कबीर परमेश्वर की शरण परम भाग्यवान आत्मा को ही नसीब होती है। असंख्य जन्मों के पुण्यों का संग्रह होने पर ही सदगुरु जी की शरण प्राप्त होती है पूर्ण मोक्ष के लिए, सतलोक पहुंचने के लिए।
सदगुरु स्वयं परमेश्वर ही होते है, वही तत्वदर्शी सन्त की भूमिका निभाते है। "कबीर मंसूर" नामक ग्रन्थ के दूसरे प्रकरण में परमेश्वर कबीर साहिब ने कहा है कि "मैं ही स्वयं सतपुरुष और मैं ही स्वयं अपना प्रतिनिधि आप हुँ" अर्थात् परमेश्वर कबीर साहिब जी किसी को भी अपना प्रतिनिधि बनाकर नहीं भेजते वह स्वयं ही प्रतिनिधि रुप में आते है।"
सतपुरुष कबीर साहेब स्वयं ही सदगुरु और तत्वदर्शी सन्त की लीला करते है। वह अपने आप को छुपाते हुए लीला करते है।नानक साहेब जी ने परमेश्वर कबीर साहिब जी को सतपुरुष रुप में पहचान कर कहा था...
फाही सूरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देश,
खरा सियाणा बहुता भार, ये धाणक रूप रहा करतार।
परमात्मा पाने के लिए ऋषियों-मुनियों, राजाओं ने क्या कुछ नहीं किया...
उस परमात्मा को पाने के लिए मंसूर अली ने हँसते-हँसते अपनी जान दे दी।
उस परमात्मा पाने के लिए सुलतान अधम ने अपने इन्द्र समान राज को ठोकर मार दी।
परमात्मा को पाने के लिए गोपीचन्द व भरतरि ने अपना राज त्याग कर 12 साल तक अधभूखे प्यासे रहे।
उस परमात्मा को पाने के लिए शेख फरीद ने 12 साल तक सवा मण अन्न खाया, कुएं में उल्टा लटककर धोर तप किया।
उस परमात्मा की चाह में बाजीद और पीपा ने अपना राज त्याग दिया, भिक्षा का भोजन खाया।
उस परमात्मा की चाह में ऋषियों ने अपना शरीर गला दिया।
परमात्मा की सत्यता पर ही ईसा मसीह जी ने अपने शरीर में कीलो की भयंकर पीड़ा झेली, सुकरात ने जहर का प्याला पिया। राम कृष्ण को भी यातनाओं का शिकार होना पड़ा।
उस परमात्मा की प्राप्ति के लिए महापुरुषों ने अपना शरीर तक न्यौछावर कर दिया, राजाओं ने राज त्याग दिये, भिक्षा का भोजन खाया, कठिन-कठिन यातनाएँ सही, उस परमात्मा को पाने के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया...तो कैसा होगा वह परमात्मा और कैसा होगा उसका वह देश।
आज उस परमपिता की विशेष दया व रजा हम तुच्छ जीवों पर हुई है और हमें सहज में परमात्मा मिल गये।
परमेश्वर कबीर साहिब जी बताते है...
कबीर, संत सेव गुरु बन्दगी, गुरु सुमिरण वैराग,
ये तो तबही पाईये, जब पूरण मस्तक भाग।
ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास,
गुरु सेवा ते पाइये, सतगुरु चरण निवास।
कबीर, सतगुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय,
धन्य शिष्य धन्य भाग तिहि, जो ऐसी सुधि पाय।
कबीर, भक्ति भक्ति सब कोई कहै, भक्ति को न जाने भेव,
पूरण भक्ति जब मिले, कृपा करे सतगुरुदेव।
इस काल लोक की असंख्य आत्माओं में से कुछ ही आत्माओं पर पूर्ण परमेश्वर की कलम तोड़ दया व कृपा हुई है अपने वास्तविक घर सतलोक जाने के लिए। असंख्य जन्मों के बाद ऐसा योग बनता है, परमेश्वर की विशेष दया व रजा होती है। इसलिए भगत भाईयो बहनों अब हमें सदगुरु जी (जो स्वयं परमेश्वर ही होते है) के चरणों से एक पल भी दूर नहीं होना है जी। बहुत दिन हो गये है इस वियोग को, बहुत दिनो से दुखी हो लिए यहाँ पर। अब सिर्फ एक ही प्रथम और अन्तिम उद्देश्य बचा है सदगुरु जी की दया से सतलोक प्राप्ति।
सतलोक जाने लिए परमात्मा ने बहुत ही सुन्दर बात बताई है... "द्वार धनी के पडा रहे, धक्के धणी कै खाय,
सौ काल झकझौर ही पर द्वार छोड़ ना जाए।"
परमात्मा कहते है कि...
कोटि जन्म तुझे भरमत हो गये, कुछ नहीं हाथ लग्या रे,
कूकर शूकर खर भया बौरे, कौआ हंस बुगा रे।
कोटि जन्म तू राजा कीन्हा, मिटि ना मन की आशा,
भिक्षुक होकर दर-दर घूम लिया, मिला ना निर्गुण रासा।
असंख जनम तुझे मरते हो गये, जीवित क्यों ना मरै रे,
द्वादश मध्य महल मठ बौरे, बहुरि ना देह धरै रे।
चार मुक्ति जहाँ चंपी करती, माया हो रही दासी,
दास गरीब अभय पद परसै, वो मिले राम अविनाशी।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रतनागर।
हे परमात्मा आपके चरणों में कोटि-कोटि दण्ड़वत प्रणाम, आपने हम तुच्छ जीवों पर दया की काल की त्रास से बचाकर अपनी शरण में लिया।
हे मालिक आपके चरणों में अब एक ही विनती है...
"बार-बार विनती करुं, विनय करुं कर जोड़,
अबकी बार उबारियों, मेरे सदगुरु बन्दीछोड़।"
Posted via Blogaway
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