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Wednesday, 12 November 2014

सार सब्द!! शब्द करावे साधना शब्द ना चिन्हा जाय

सार सब्द!!
शब्द करावे साधना शब्द ना चिन्हा जाय

जप तप पुजा आदी ले मरे कमाय कमाय ।।
साधु मेरे सब बडे अपनी अपनी ठोर।
कोई शब्द विवेकी पारखी मेरे सिर माथे
का मोर।।
शब्द शब्द सब कोई बखाना सार शब्द कौई
विरला जाना ।।
जाप मरे अजपा मरे अनहद भी मर जाय।
सुरत समानी शबद मे वा को काल न खाय।।
बावन अक्षर मे संसार नि:अक्षर सो लोक
पसार ।
सौई नाम हे अक्षर वासा काया ते बाहर
परकाशा ।।
शब्द शब्द सब कोई कहे वह तो शब्द विदेह।
जिव्ह्या पर आवे नही निरख परख कर लेय
।।
संतौ सब शब्द ही शब्द बखाना शब्द फाँस
फसा सब कोई शब्द नही पहचाना ।
सब्द ही सरगुण सब्द ही निरगुण
शब्द
ही भ्रम भुलाया ।।
गुरू गुरू मे भेद हे गुरू गुरू मे भाव गुरू
सोही बन्धिये जौ शब्द बतावे दाव ।।
चार अरब कबीर ने भाका सार सब्द बाहर
करी राखा।
{ सदगुरू कबीर} —

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