पराण संगली (पंजाबी लीपी में) संपादक: डाॅ. जगजीत सिह खानपुरी पब्लिकेशन ब्यूरो पंजाबी युनिवर्सिटी, पटियाला। प्रकाशित सन् 1961 के पृष्ठ न. 399 से सहाभार गोष्टी
बाबे नानक और कबीर जी की
(कबीर जी)
उह गुरु जी चरनि लागि करवै,
बीनती को पुन करीअहु देवा।
अगम अपार अभै पद कहिए,
सो पाईए कित सेवा।।
मुहि समझाई कहहु गुरु पूरे,
भिन्न-भिन्न अर्थ दिखावहु।
जिह बिधि परम अभै पद पाईये,
सा विधि मोहि बतावहु।
मन बच करम कृपा करि दीजै,
दीजै शब्द उचारं।।
कहै कबीर सुनहु गुरु नानक,
मैं दीजै शब्द बीचारं।।1।।
(नानक जी)
नानक कह सुनों कबीर जी,
सिखिया एक हमारी।
तन मन जीव ठौर कह ऐकै,
सुंन लागवहु तारी।।
करम अकरम दोऊँ तियागह,
सहज कला विधि खेलहु।
जागत कला रहु तुम निसदिन,
सतगुरु कल मन मेलहु।।
तजि माया र्निमायल होवहु,
मन के तजहु विकारा।
नानक कह सुनहु कबीर जी,
इह विधि मिलहु अपारा।।2।।
(कबीर जी)
गुरु जी माया सबल निरबल जन तेरा,
क्युं अस्थिर मन होई।
काम क्रोध व्यापे मोकु,
निस दिन सुरति निरत बुध खोई।।
मन राखऊ तवु पवण सिधारे,
पवण राख मन जाही।
मन तन पवण जीवैं होई एकै,
सा विधि देहु बुझााई।।3।।
(नानक जी)
दिृढ करि आसन बैठहु वाले,
उनमनि ध्यान लगावहु।
अलप-अहार खण्ड कर निन्द्रा,
काम क्रोध उजावहु।।
नौव दर पकड़ि सहज घट राखो,
सुरति निरति रस उपजै।
गुरु प्रसादी जुगति जीवु राखहु,
इत मंथत साच निपजै।।4।।
(कबीर जी)
(कबीर कवन सुखम कवन स्थूल कवन डाल कवन है मूल)
गुरु जी किया लै बैसऊ,
किआ लेहहु उदासी।
कवन अग्नि की धुणी तापऊ,
कवन मड़ी महि बासी।।5।।
(नानक जी)
(नानक ब्रह्म सुखम सुंन असथुल,
मन है पवन डाल है मूल)
करम लै सोवहु सुरति लै जागहु,
ब्रह्म अग्नि ले तापहु।
निस बासर तुम खोज खुजावहु,
संुन मण्डल ले डूम बापहु।।6।।
(सतगुरु कहै सुनहे रे चेला,
ईह लछन परकासे)
(गुरु प्रसादि सरब मैं पेखहु,
सुंन मण्डल करि वासे)
(कबीर जी)
सुआमी जी जाई को कहै,
ना जाई वहाँ क्या अचरज होई जाई।
मन भै चक्र रहऊ मन पूरे,
सा विध देहु बताई।।7।।
(अपना अनभऊ कहऊ गुरु जी,
परम ज्योति किऊं पाई।)
(नानक जी)
ससी अर चड़त देख तुम लागे,
ऊहाँ कीटी भिरणा होता।
नानक कह सुनहु कबीरा,
इत बिध मिल परम तत जोता।।8।।
(कबीर जी)
धन धन धन गुरु नानक,
जिन मोसो पतित उधारो।
निर्मल जल बतलाइया मो कऊ,
राम मिलावन हारो।।9।।
(नानक जी)
जब हम भक्त भए सुखदेवा,
जनक विदेह किया गुरुदेवा।
कलि महि जुलाहा नाम कबीरा,
ढूंड थे चित भईआ न थीरा।।
बहुत भांति कर सिमरन कीना,
इहै मन चंचल तबहु न भिना।
जब करि ज्ञान भए उदासी,
तब न काटि कालहि फांसी।।
जब हम हार परे सतिगुरु दुआरे,
दे गुरु नाम दान लीए उधारे।।10।।
(कबीर जी)
सतगुरु पुरुख सतिगुरु पाईया,
सतिनाम लै रिदै बसाईआ।
जात कमीना जुलाहा अपराधि,
गुरु कृपा ते भगति समाधी।।
मुक्ति भइआ गुरु सतिगुरु बचनी,
गईया सु सहसा पीरा।
जुग नानक सतिगुरु जपीअ,
कीट मुरीद कबीरा।।11।।
सुनि उपदेश सम्पूर्ण सतगुरु का,
मन महि भया अनंद।
मुक्ति का दाता बाबा नानक,
रिंचक रामानन्द।।12।
बाबे नानक और कबीर जी की
(कबीर जी)
उह गुरु जी चरनि लागि करवै,
बीनती को पुन करीअहु देवा।
अगम अपार अभै पद कहिए,
सो पाईए कित सेवा।।
मुहि समझाई कहहु गुरु पूरे,
भिन्न-भिन्न अर्थ दिखावहु।
जिह बिधि परम अभै पद पाईये,
सा विधि मोहि बतावहु।
मन बच करम कृपा करि दीजै,
दीजै शब्द उचारं।।
कहै कबीर सुनहु गुरु नानक,
मैं दीजै शब्द बीचारं।।1।।
(नानक जी)
नानक कह सुनों कबीर जी,
सिखिया एक हमारी।
तन मन जीव ठौर कह ऐकै,
सुंन लागवहु तारी।।
करम अकरम दोऊँ तियागह,
सहज कला विधि खेलहु।
जागत कला रहु तुम निसदिन,
सतगुरु कल मन मेलहु।।
तजि माया र्निमायल होवहु,
मन के तजहु विकारा।
नानक कह सुनहु कबीर जी,
इह विधि मिलहु अपारा।।2।।
(कबीर जी)
गुरु जी माया सबल निरबल जन तेरा,
क्युं अस्थिर मन होई।
काम क्रोध व्यापे मोकु,
निस दिन सुरति निरत बुध खोई।।
मन राखऊ तवु पवण सिधारे,
पवण राख मन जाही।
मन तन पवण जीवैं होई एकै,
सा विधि देहु बुझााई।।3।।
(नानक जी)
दिृढ करि आसन बैठहु वाले,
उनमनि ध्यान लगावहु।
अलप-अहार खण्ड कर निन्द्रा,
काम क्रोध उजावहु।।
नौव दर पकड़ि सहज घट राखो,
सुरति निरति रस उपजै।
गुरु प्रसादी जुगति जीवु राखहु,
इत मंथत साच निपजै।।4।।
(कबीर जी)
(कबीर कवन सुखम कवन स्थूल कवन डाल कवन है मूल)
गुरु जी किया लै बैसऊ,
किआ लेहहु उदासी।
कवन अग्नि की धुणी तापऊ,
कवन मड़ी महि बासी।।5।।
(नानक जी)
(नानक ब्रह्म सुखम सुंन असथुल,
मन है पवन डाल है मूल)
करम लै सोवहु सुरति लै जागहु,
ब्रह्म अग्नि ले तापहु।
निस बासर तुम खोज खुजावहु,
संुन मण्डल ले डूम बापहु।।6।।
(सतगुरु कहै सुनहे रे चेला,
ईह लछन परकासे)
(गुरु प्रसादि सरब मैं पेखहु,
सुंन मण्डल करि वासे)
(कबीर जी)
सुआमी जी जाई को कहै,
ना जाई वहाँ क्या अचरज होई जाई।
मन भै चक्र रहऊ मन पूरे,
सा विध देहु बताई।।7।।
(अपना अनभऊ कहऊ गुरु जी,
परम ज्योति किऊं पाई।)
(नानक जी)
ससी अर चड़त देख तुम लागे,
ऊहाँ कीटी भिरणा होता।
नानक कह सुनहु कबीरा,
इत बिध मिल परम तत जोता।।8।।
(कबीर जी)
धन धन धन गुरु नानक,
जिन मोसो पतित उधारो।
निर्मल जल बतलाइया मो कऊ,
राम मिलावन हारो।।9।।
(नानक जी)
जब हम भक्त भए सुखदेवा,
जनक विदेह किया गुरुदेवा।
कलि महि जुलाहा नाम कबीरा,
ढूंड थे चित भईआ न थीरा।।
बहुत भांति कर सिमरन कीना,
इहै मन चंचल तबहु न भिना।
जब करि ज्ञान भए उदासी,
तब न काटि कालहि फांसी।।
जब हम हार परे सतिगुरु दुआरे,
दे गुरु नाम दान लीए उधारे।।10।।
(कबीर जी)
सतगुरु पुरुख सतिगुरु पाईया,
सतिनाम लै रिदै बसाईआ।
जात कमीना जुलाहा अपराधि,
गुरु कृपा ते भगति समाधी।।
मुक्ति भइआ गुरु सतिगुरु बचनी,
गईया सु सहसा पीरा।
जुग नानक सतिगुरु जपीअ,
कीट मुरीद कबीरा।।11।।
सुनि उपदेश सम्पूर्ण सतगुरु का,
मन महि भया अनंद।
मुक्ति का दाता बाबा नानक,
रिंचक रामानन्द।।12।
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