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Thursday, 23 July 2015

Sant ram pal ji

गहरी नजर
गीता में ......
(Shrimad Bhagavad Gita)

पूर्ण परमात्मा(पूर्ण ब्रह्म) अर्थात् सतपुरुष का ज्ञान न होने
के कारण सर्व विद्वानों को ब्रह्म(निरंजन- काल भगवान जिसे
महाविष्णु कहते हैं) तक का ज्ञान है। पवित्र आत्माऐं चाहे
वे ईसाई हैं, मुसलमान, हिन्दू या सिख हैं इनको केवल अव्यक्त
अर्थात् एक ओंकार परमात्मा की पूजा का
ही ज्ञान पवित्र शास्त्रों (जैसे पुराणों, उपनिष्दांे,
कतेबों, वेदों, गीता आदि नामों से जाना जाता है) से हो
पाया। क्योंकि इन सर्व शास्त्रों में ज्योति स्वरूपी
(प्रकाशमय) परमात्मा ब्रह्म की ही
पूजा विधि का वर्णन है तथा जानकारी पूर्ण ब्रह्म
(सतपुरुष) की भी है। पूर्ण संत
(तत्वदर्शी संत) न मिलने से पूर्ण ब्रह्म
की पूजा का ज्ञान नहीं हुआ। जिस
कारण से पवित्र आत्माऐं ईसाई फोर्मलैस गौड (निराकार प्रभु)
कहते हैं। जबकि पवित्र बाईबल में उत्पत्ति विषय के सृष्टि
की उत्पत्ति नामक अध्याय में लिखा है कि प्रभु ने
मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया तथा छः दिन में
सृष्टि रचना करके सातवें दिन विश्राम किया। इससे स्वसिद्ध है कि
प्रभु भी मनुष्य जैसे आकार में है। इसी
का प्रमाण पवित्र र्कुआन शरीफ में भी
है। इसी प्रकार पवित्र आत्माऐं मुस्लमान प्रभु को
बेचून (निराकार) अल्लाह (प्रभु) कहते हैं, जबकि पवित्र
र्कुआन शरीफ के सुरत फूर्कानि संख्या 25, आयत
संख्या 52 से 59 में लिखा है कि जिस प्रभु ने छः दिन में सृष्टि
रची तथा सातवें दिन तख्त पर जा विराजा, उसका नाम
कबीर है। पवित्र र्कुआन को बोलने वाला प्रभु
किसी और कबीर नामक प्रभु
की तरफ संकेत कर रहा है तथा कह रहा है कि
वही कबीर प्रभु ही पूजा के
योग्य है, पाप क्षमा करने वाला है, परन्तु उसकी
भक्ति के विषय में मुझे ज्ञान नहीं, किसी
तत्वदर्शी संत से पूछो। उपरोक्त दोनों पवित्र शास्त्रों
(पवित्र बाईबल व पवित्र र्कुआन शरीफ) ने मिल-जुल
कर सिद्ध कर दिया है कि परमेश्वर मनुष्य सदृश
शरीर युक्त है। उसका नाम कबीर है।
पवित्र आत्माऐं हिन्दू व सिख उसे निरंकार(निर्गुण ब्रह्म) के नाम
से जानते हैं। जबकि आदरणीय नानक साहेब
जी ने सतपुरुष के आकार रूप में दर्शन करने के बाद
अपनी अमृतवाणी महला पहला
‘श्रीगुरु ग्रन्थ साहेब‘ में पूर्ण ब्रह्म का आकार
होने का प्रमाण दिया है, लिखा है ‘‘धाणक रूप रहा करतार (पृष्ठ
24), हक्का कबीर करीम तू बेएब
परवरदिगार(पृष्ठ 721)‘‘ तथा प्रभु के मिलने से पहले पवित्र
हिन्दू धर्म में जन्म होने के कारण श्री ब्रजलाल
पाण्डे से पवित्र गीता जी को पढ़कर
श्री नानक साहेब जी ब्रह्म को निराकार
कहा करते थे। उनकी दोनों प्रकार की
अमृतवाणी गुरु ग्रन्थ साहेब मे लिखी हैं।
हिन्दुओं के शास्त्रों में पवित्र वेद व गीता विशेष हैं,
उनके साथ-2 अठारह पुराणों को भी समान
दृष्टी से देखा जाता है। श्रीमद् भागवत
सुधासागर, रामायण, महाभारत भी विशेष प्रमाणित
शास्त्रों में से हैं। विशेष विचारणीय विषय यह है कि
जिन पवित्र शास्त्रों को हिन्दुओं के शास्त्र कहा जाता है, जैसे
पवित्र चारों वेद व पवित्र श्रीमद् भगवत
गीता जी आदि, वास्तव में ये सद् शास्त्र
केवल पवित्र हिन्दु धर्म के ही नहीं
हैं। ये सर्व शास्त्र महर्षि व्यास जी द्वारा उस
समय लिखे गए थे जब कोई अन्य धर्म नहीं था।
इसलिए पवित्र वेद व पवित्र श्रीमद्भगवत
गीता जी तथा पवित्र पुराणादि सर्व मानव
मात्र के कल्याण के लिए हैं। पवित्र यजुर्वेद अध्याय 1 मंत्र
15-16 तथा अध्याय 5 मंत्र 1 व 32 में स्पष्ट किया है कि
‘‘{अग्नेः तनूर् असि, विष्णवे त्वा सोमस्य तनुर् असि, कविरंघारिः असि,
स्वज्र्योति ऋतधामा असि} परमेश्वर का शरीर है, पाप
के शत्रु परमेश्वर का नाम कविर्देव है, उस सर्व पालन कत्र्ता
अमर पुरुष अर्थात् सतपुरुष का शरीर है। वह
स्वप्रकाशित शरीर वाला प्रभु सत धाम अर्थात् सतलोक
में रहता है। पवित्र वेदों को बोलने वाला ब्रह्म यजुर्वेद अध्याय
40 मंत्र 8 में कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा
कविर्मनीषी अर्थात् कविर्देव
ही वह तत्वदर्शी है
जिसकी चाह सर्व प्राणियों को है, वह कविर्देव
परिभूः अर्थात् सर्व प्रथम प्रकट हुआ, जो सर्व प्राणियों
की सर्व मनोकामना पूर्ण करता है। वह कविर्देव
स्वयंभूः अर्थात् स्वयं प्रकट होता है, उसका शरीर
किसी माता-पिता के संयोग से (शुक्रम् अकायम्)
वीर्य से बनी काया नहीं है,
उसका शरीर (अस्नाविरम्) नाड़ी रहित है
अर्थात् पांच तत्व का नहीं है, केवल तेजपुंज से
एक तत्व का है, जैसे एक तो मिट्टी की
मूर्ति बनी है, उसमें भी नाक, कान आदि
अंग हैं तथा दूसरी सोने की मूर्ति
बनी है, उसमें भी सर्व अंग हैं।
ठीक इसी प्रकार पूज्य कविर्देव का
शरीर तेज तत्व का बना है, इसलिए उस परमेश्वर के
शरीर की उपमा में अग्नेः तनूर् असि वेद में
कहा है।
सर्व प्रथम पवित्र शास्त्र श्रीमद्भगवत
गीता जी पर विचार करते हैं।

”पवित्र श्रीमद्भगवत
गीता जी का ज्ञान
किसने कहा?“.......

पवित्र गीता जी के ज्ञान को उस समय
बोला गया था जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था। अर्जुन ने
युद्ध करने से इन्कार कर दिया था। युद्ध क्यों हो रहा था? इस
युद्ध को धर्मयुद्ध की संज्ञा भी
नहीं दी जा सकती क्योंकि दो
परिवारों का सम्पत्ति वितरण का विषय था। कौरवों तथा पाण्डवों का
सम्पत्ति बंटवारा नहीं हो रहा था। कौरवों ने पाण्डवों
को आधा राज्य भी देने से मना कर दिया था। दोनों पक्षों
का बीच-बचाव करने के लिए प्रभु श्री
कृष्ण जी तीन बार शान्ति दूत बन कर
गए। परन्तु दोनों ही पक्ष अपनी-
अपनी जिद्द पर अटल थे। श्री कृष्ण
जी ने युद्ध से होने वाली हानि से
भी परिचित कराते हुए कहा कि न जाने
कितनी बहन विधवा होंगी ? न जाने कितने
बच्चे अनाथ होंगे ? महापाप के अतिरिक्त कुछ नहीं
मिलेगा। युद्ध में न जाने कौन मरे, कौन बचे ?
तीसरी बार जब श्री कृष्ण
जी समझौता करवाने गए तो दोनों पक्षों ने अपने-अपने
पक्ष वाले राजाओं की सेना सहित सूची
पत्र दिखाया तथा कहा कि इतने राजा हमारे पक्ष में हैं तथा इतने
हमारे पक्ष में। जब श्री कृष्ण जी ने
देखा कि दोनों ही पक्ष टस से मस नहीं
हो रहे हैं, युद्ध के लिए तैयार हो चुके हैं। तब
श्री कृष्ण जी ने सोचा कि एक दाव और
है वह भी आज लगा देता हूँ। श्री
कृष्ण जी ने सोचा कि कहीं पाण्डव मेरे
सम्बन्धी होने के कारण अपनी जिद्द
इसलिए न छोड़ रहे हों कि श्री कृष्ण हमारे साथ हैं,
विजय हमारी ही होगी
(क्योंकि श्री कृष्ण जी की
बहन सुभद्रा जी का विवाह श्री अर्जुन
जी से हुआ था)। श्री कृष्ण
जी ने कहा कि एक तरफ मेरी सर्व सेना
होगी और दूसरी तरफ मैं होऊँगा और
इसके साथ-साथ मैं वचन बद्ध भी होता हूँ कि मैं
हथियार भी नहीं उठाऊँगा। इस घोषणा से
पाण्डवों के पैरों के नीचे की
जमीन खिसक गई। उनको लगा कि अब
हमारी पराजय निश्चित है। यह विचार कर पाँचों
पाण्डव यह कह कर सभा से बाहर गए कि हम कुछ विचार कर
लें। कुछ समय उपरान्त श्री कृष्ण जी को
सभा से बाहर आने की प्रार्थना की।
श्री कृष्ण जी के बाहर आने पर पाण्डवों
ने कहा कि हे भगवन् ! हमें पाँच गाँव दिलवा दो। हम युद्ध
नहीं चाहते हैं। हमारी इज्जत
भी रह जाएगी और आप चाहते हैं कि
युद्ध न हो, यह भी टल जाएगा।
पाण्डवों के इस फैसले से श्री कृष्ण जी
बहुत प्रसन्न हुए तथा सोचा कि बुरा समय टल गया।
श्री कृष्ण जी वापिस आए, सभा में केवल
कौरव तथा उनके समर्थक शेष थे। श्री कृष्ण
जी ने कहा दुर्योधन युद्ध टल गया है।
मेरी भी यह हार्दिक इच्छा
थी। आप पाण्डवों को पाँच गाँव दे दो, वे कह रहे हैं
कि हम युद्ध नहीं चाहते। दुर्योधन ने कहा कि
पाण्डवों के लिए सुई की नोक तुल्य भी
जमीन नहीं है। यदि उन्हंे राज्य
चाहिए तो युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में आ जाऐं। इस बात
से श्री कृष्ण जी ने नाराज होकर कहा
कि दुर्योधन तू इंसान नहीं शैतान है। कहाँ आधा
राज्य और कहाँ पाँच गाँव? मेरी बात मान ले, पाँच गाँव
दे दे। श्री कृष्ण से नाराज होकर दुर्योधन ने सभा में
उपस्थित योद्धाओं को आज्ञा दी कि श्री
कृष्ण को पकड़ो तथा कारागार में डाल दो। आज्ञा मिलते
ही योद्धाओं ने श्री कृष्ण जी
को चारों तरफ से घेर लिया। श्री कृष्ण जी
ने अपना विराट रूप दिखाया। जिस कारण सर्व योद्धा और कौरव डर
कर कुर्सियों के नीचे घुस गए तथा शरीर के
तेज प्रकाश से आँखें बंद हो गई। श्री कृष्ण
जी वहाँ से निकल गए।
आओ विचार करें:- उपरोक्त विराट रूप दिखाने का प्रमाण संक्षिप्त
महाभारत गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित में
प्रत्यक्ष है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पवित्र
गीता जी का ज्ञान सुनाते समय अध्याय
11 श्लोक 32 में पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह
रहा है कि ‘अर्जुन मैं बढ़ा हुआ काल हूँ। अब सर्व लोकों को
खाने के लिए प्रकट हुआ हूँ।‘ जरा सोचें कि श्री
कृष्ण जी तो पहले से ही
श्री अर्जुन जी के साथ थे। यदि पवित्र
गीता जी के ज्ञान को श्री
कृष्ण जी बोल रहे होते तो यह नहीं
कहते कि अब प्रवत्र्त हुआ हूँ। फिर अध्याय 11 श्लोक 21
व 46 में अर्जुन कह रहा है कि भगवन् ! आप तो ऋषियों,
देवताओं तथा सिद्धों को भी खा रहे हो, जो आप का
ही गुणगान पवित्र वेदों के मंत्रों द्वारा उच्चारण कर
रहे हैं तथा अपने जीवन की रक्षा के
लिए मंगल कामना कर रहे हैं। कुछ आपके दाढ़ों में लटक रहे
हैं, कुछ आप के मुख में समा रहे हैं। हे सहò बाहु अर्थात्
हजार भुजा वाले भगवान ! आप अपने उसी चतुर्भुज
रूप में आईये। मैं आपके विकराल रूप को देखकर धीरज
नहीं कर पा रहा हूँ।
अध्याय 11 श्लोक 47 में पवित्र गीता जी
को बोलने वाला प्रभु काल कह रहा है कि ‘हे अर्जुन यह मेरा
वास्तविक काल रूप है, जिसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी
ने नहीं देखा था।‘ उपरोक्त विवरण से एक तथ्य तो
यह सिद्ध हुआ कि कौरवों की सभा में विराट रूप
श्री कृष्ण जी ने दिखाया था तथा यहाँ
युद्ध के मैदान में विराट रूप काल (श्री कृष्ण
जी के शरीर मंे प्रेतवत् प्रवेश करके
अपना विराट रूप काल) ने दिखाया था। नहीं तो यह
नहीं कहता कि यह विराट रूप तेरे अतिरिक्त पहले
किसी ने नहीं देखा है। क्योंकि
श्री कृष्ण जी अपना विराट रूप कौरवों
की सभा में पहले ही दिखा चुके थे।
दूसरी यह बात सिद्ध हुई कि पवित्र गीता
जी को बोलने वाला काल(ब्रह्म-ज्योति निरंजन) है, न
कि श्री कृष्ण जी। क्योंकि
श्री कृष्ण जी ने पहले कभी
नहीं कहा कि मैं काल हूँ तथा बाद में
कभी नहीं कहा कि मैं काल हूँ।
श्री कृष्ण जी काल नहीं हो
सकते। उनके दर्शन मात्र को तो दूर-दूर क्षेत्र के
स्त्री तथा पुरुष तड़फा करते थे। यही
प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 24. 25 में है जिसमें
गीता ज्ञान दाता प्रभु ने कहा है कि
बुद्धिहीन जन समुदाय मेरे उस घटिया (अनुत्तम)
विद्यान को नहीं जानते कि मैं कभी
भी मनुष्य की तरह किसी के
सामने प्रकट नहीं होता। मैं अपनी
योगमाया से छिपा रहता हूँ।
उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता
श्री कृष्ण जी नहीं है।
क्योंकि श्री कृष्ण जी तो सर्व समक्ष
साक्षात् थे। श्री कृष्ण नहीं कहते कि
मैं अपनी योग माया से छिपा रहता हूँ। इसलिए
गीता जी का ज्ञान श्री कृष्ण
जी के अन्दर प्रेतवत् प्रवेश करके काल ने बोला था।



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