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Monday, 16 March 2015

Satlok barwala kand 2014


विशेष संवाददाता :-सतलोक आश्रम बरवाला (हरियाणा ) के संचालक संत रामपाल जी के बारे में लोगों से चौकाने वाली बातो का खुलासा हुआ है, जिसे सुनकर आप भी सोच में पड़ जायेगे, पढिये संक्षिप्त प्राप्त जानकारी अनुसार
कुछ दिनों पहले सतलोक आश्रम की गुंज विश्व के कोने कोने में सुनाई दे रही थी, मिडिया ध्दारा बताये गये काले सच को सुनकर हर कोई के मुंह से निकल रहा था कि आजकल बाबागिरी कर लोगों को मुर्ख बनाया जा रहा है और सत्य भी है कि ज्यादातर धर्म के नाम पर कमाई की फैक्ट्री चलाते हैं, लेकिन संत रामपाल जी के सत्संग में माया रुपी जाल में नहीं फंसने की बात कही है!
आइये जानते हैं सतलोक प्रकरण क्या है
संत रामपाल जी ने कबीर पंथी गुरु रामदेवानंद जी से गुरु दीक्षा ग्रहण कर सन 1997 से घर घर, गांव गांव जाकर सत्संग पाठ प्रारंभ किया उनके भक्त बताते हैं कि रामपाल जी की पूर्ण ब्रम्ह ध्दारा ज्ञान प्राप्त हुआ और वे सभी हिन्दू धर्म के वेद, शास्त्रों, श्रीमद् गीताजी एवं कुरान, बाइबिल ऐसे सभी धर्मग्रंथों का प्रमाण देकर सही भगवान् भक्ति क्या है ये सब अपने सत्संग में बताने लगे, तब हरियाणा में अपना ज्ञान प्रचार करते हुए उन्होंने लगभग हर धर्म, पंथ (ब्रम्ह कुमारी, राधास्वामी, आसाराम आर्य समाजी ) की पूजा पध्दति, अंधविश्वासी परंपरा को शास्त्र विरुद्ध बताते हुए कहा कि सबका मालिक एक है उसे प्राप्त करने का भक्ति मार्ग भी एक ही है, ये हजारो धर्म, पंथ मनुष्य को सत् भक्ति से भटकाने का मायाजाल है, सभी को धर्म विरुद्ध ज्ञान बाट रहे हैं और मानव तन प्राप्त लोगों को गलत भक्ति देकर 84 लाख योनियों में भटकाने का कार्य कर रहे हैं, जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं मारते पर मेरा घर (ज्ञान ) मजबूत शास्त्र प्रमाणित है ओर इन कच्चे घर (शास्त्र विपरित ) में भाग्यशाली मानव जीवन को बेकार नहीं होने दुगा,
इस तरह आर्य समाज बहुल क्षेत्र हरियाणा में आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा दिया गया ज्ञान एवं उनके ध्दारा रचित ग्रन्थों ओर "सत्यार्थ प्रकाश " जिसमें लिखा है कि 1.किसी स्त्री का पति मर जाये तो उसे पुनः विवाह नहीं करना चाहिए पाप होता है, विधवा स्त्री को पति के ही खानदान में देवर, जेठ हो से ही विवाह कर लेना चाहिए, 2.और किसी स्त्री का पति कमाने बाहर गया हो और तीन साल तक वापस नहीं आता तो स्त्री को चाहिए कि वह किसी अन्य व्यक्ति से समागम कर बच्चे पैदा कर ले और पराये आदमी के बिना उस बच्चे का पालन करना चाहिए तो वह पति की ही संतान कहलायेगी, और संत रामपाल जी ने महर्षि दयानंद सरस्वती की जीवनी में वर्णित साक्ष्य देकर बताया कि वह स्वयं नशा आदि करते थे और अपने जीवन के अंतिम दिनों में भुत बाधा एवं कई जटिल बीमारियों की वजह से पापकर्म भुगत कर तङप - तङप कर मृत्यु को प्राप्त हुए, ऐसे महर्षि जो स्वयं दुर्गति को प्राप्त हुए हो तो उनके अनुयायियों को कैसे सद्गति मिल सकती है, ऐसे ही हिन्दु धर्म की आडम्बरी पूजा पध्दति व्यर्थ बताकर कहा की जो शास्त्र के विपरीत पूजा करते हैं वे महा मुर्ख है जो गीता जी में स्वयं गीता ज्ञान दाता ने कहा है
उन्होंने बताया कि अनादि काल में सनातन धर्म में मुर्ति पूजा नहीं होती थी मुर्तियां अपने गुरु एवं ईष्ट भगवान् की याद के लिए बनवाते थे और उन्हें उनके ज्ञान का प्रभाव बना रहे, जेसै कोई वैध (डाक्टर ) जीवन काल में सही जानकारी एवं उपचार देता है और उसके मरने के बाद याद के लिए मुर्ति स्थापित कर दिया जाता है मुर्ति इलाज तो नहीं करेगी पर उसे देखकर उसके बताये ज्ञान का याददाश्त जीवित होती है,
भगवान् सर्व व्यापक है लेकिन लोग जगह-जगह मंदिर बनाकर लाखों रुपये का चढ़ावा प्राप्त करते हैं गणेश , दुर्गा उत्सव में मुर्तियां लाकर काल ध्वनि (संगीत, डीजे ) में व्यसनयुक्त होकर नाचगान करते हैं ऐसे कर्मो से पापकर्म बढता है,
पितृपुजा के सम्बन्ध में भी बताया कि हमारे पूर्वज जो संस्कृत या वेदों को पढ नहीं सकते थे, वे ब्राम्हण के ऊपर पूर्ण निष्ठा रखते थे लेकिन ब्राम्हण या तो अधूरे ज्ञान के साथ या स्वार्थ वस जो अनावश्यक पूजा करवाते वही सत्य मानकर करते रहे परअब हम शिक्षित हुए तो पता चला कि जो पूजा पध्दति समाज में व्याप्त है वह शास्त्र विरुद्ध है एवं पापकारी है इसलिए हमारे पूर्वज उटपटांग बताये कर्म करते हुए अपने कर्मानुसार पितृ लोक, नर्क, पशु योनि, या अन्यत्र में चले गए और हम भी पितृ पूजा करते हैं तो उन्हीं के पास जायेगे, जिससे हमारा मोक्ष नहीं होगा ना ही हमारे पूर्वजों का भला होगा, लेकिन यदि हम सत् भक्ति करते हैं तो हम काल लोक से मुक्त हो कर मोक्ष को प्राप्त करेंगे और हमारे पूर्वज भी हमारी भक्ति के प्रभाव से पुनः मनुष्य जन्म लेकर भक्ति कर मोक्ष प्राप्त करते हैं,
इस ब्रम्हांड का मालि

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