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Monday, 23 March 2015

Saat surt ka bhed batau


��चौपाई��
सात सूरत का सकल पसारा
सात सूरत ते कोई न न्यारा।
          2
सात सुरत का भेद बताऊं।
तामें ज्ञान सकल समझाऊं।।
          3
उतपत्ति परले वाके माही।
गत सों कोई न्यारा नाहीं।।
        4
प्रथम अमी सुरत निज ठौरा।
तहां निरन्जन कीना दौरा।।
     5
वहां जाय अमी ले आवे ।
तासों अजर बीज उपजावे।।
         6
सोई बीज रक्त में धरही ।
यही विधि सों सब उत्पति करही।।
         7
बीजहि जल कि रंग कहाया।
तासों रची सकल की काया।
      8
दूजा मूल सुर्त तेहि संगा ।
घट घट माहि बनाव रंगा।।
         9
तीजो चमक सुर्त अवारा।
नौ नाड़ी में कीन पसारा।।
10
कोठा तहां बहत्तर करही।
रोम रोम युक्ति सब धरही।।
        11
चौथी शून्य सुर्त है भाई।
धर्मदास मैं तुम्है लखाई।।
        12
पांचवी सर्त सबन के ठांई।
शुभ अरू अशुभ सुनावे दोई।
         13
छठी सुर्त ठिकाना भाखे।
ठांव ठांव स्वाद तेहि चाखे।।
          14☝
सो तो रहे कण्ठ के धारा
बानी भाख करे उचारा।।
         15
सतई सुर्त रहे तन मांही।
हिरदे सो कहूँ न्यारी नांही।।
         16
ब्रह्म स्वरूप धर तहां वह बैठा।
गुप्त पसार सकल घट पैठा।।
         17
कोई न जाने ताका मरम।
ज्ञानी ध्यानी सबही भरम।।
      18
सात सुरत का कहां विचारा।
धर्मदास कछु वार na para

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