सतलोक की सुन्दरता और महिमा का मनमोहक वर्णन-- कृप्या ध्यान से पढे बडा आन्नद आयेगा----
सत् साहिबबन्दी छोड़ गरीब दास जी महाराज ने सतलोक का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है जी...गरीब श्वेत सिंहासन श्वेत ही अंगा,श्वेत छत्र जाँका श्वेत ही रंगा,श्वेत ख्वास श्वेत ही चौरा,श्वेत पोप श्वेत ही भौरा,श्वेत नाद श्वेत ही तूरा,श्वेत सिंहासन नाँचे हूरा,श्वेत नदी जहाँ श्वेत ही वृक्षा,श्वेत चन्द्र जहाँ मस्तक चर्चा,श्वेत सरोवर श्वेत ही थाना,श्वेत ध्वजा और श्वेत ही निशाना,श्वेत ही सरोवर, श्वेत ही हंसा,श्वेत ही जाँका सब कुल वंशा,श्वेत ही मन्दर चन्दर ज्योति,श्वेत ही मानिक मुक्ता मोती,श्वेत ही गुमट, वहाँ श्वेत ही स्थाना,श्वेत ध्वजा वहाँ श्वेत ही निशाना,गरीबदास ये धाम हमारा, सुर नर मुनिजन करो विचारा।आदि सनातन पंथ है हमारा।बिन ही पंथ, पंथ है भाई, बिन चरणा चालै सो जाई।परमात्मा बता रहे है कि सतलोक में बिना चरणों के अर्थात् विहंगम मार्ग से जाया जाता है।
सत् साहेबजय हो बन्दी छोड़ की.अपने सतलोक के विषय में परमेश्वर कबीर साहेब बता रहे है...चल देखो देश हमारा रे, जहाँ कोटि पदम उजियारा रे,चल देखो देश हमारा रे, जहाँ सतशब्द झनकारा रे,चल देखो देश हमारा रे, जहाँ उजल भँवर गुंजारा रे,चल देखो देश हमारा रे, जहाँ चवंर सुहगंम डारा रे,चल देखो देश हमारा रे, जहाँ चन्द्र सूरज नहीं तारा रे,चल देखो देश हमारा रे, नहीं धर अम्बर कैनारा रे,चल देखो देश हमारा रे, जहाँ अनन्त फूल गुलजारा रे,चल देखो देश हमारा रे, जहाँ भाटी चवै कलारा रे,चल देखो देश हमारा रे, जहाँ धूमत है मतवारा रे,रे मन कीजै दारमदारा रे तुझे ले छोडूं दरबारा रे,फिर वापिस ना ही आवे रे सतगुरु सब नाँच मिटावै रे,चल अजब नगर विश्रामा रे, तुम छोड़ो देना बाना रे,चल देखो देश अमानी रे, जहाँ कुछ पावक ना पानीरे,चल देखो देश अमानी रे, जहाँ झलकै बारा बानी रे,चल अक्षर धाम चलाऊं रे, मैं अवगत पंथ लखाऊं रे,कर मकरतार पियाना रे, क्यों शब्दै शब्द समाना रे,जहाँ झिलझिल दरिया नागर रे, जहाँ हंस रहे सुखसागर रे,जहाँ अनहद नाद बजन्ता रे, जहाँ कुछ आदि नहीं अन्ता रे,जहाँ अजब हिरम्बर हीरा रे, जहाँ हंस रहे सुख तीरा रे,जहाँ अजब हिरम्बर हीरा रे, जहाँ यम दण्ड नहीं दुख पीडा रे......आदरणीय गरीब दास जी महाराज परमेश्वर कबीर साहिब जी को सतलोक में आँखों देख कर बता रहे हैं...चल देखो देश अमानी रे मैं तो सतगुरु पर कुर्बानी रे,चल देखो देश बिलन्दा रे, जहाँ बसे कबीरा जिन्दा रे,चल देखो देश अगाहा रे, जहाँ बसे कबीर जुलाहा रे,चल देखो देश अमोली रे, जहाँ बसे कबीरा कोली रे,चल देखो देश अमाना रे, जहाँ बुने कबीरा ताना रे,चल अवगत नगर निबासा रे, जहाँ नहीं मन माया काबासा रे,चल देखो देश अगाहा रे, जहाँ बसै कबीर जुलाहा रे...हे मालिक आपके चरणों में कोटि कोटि दण्डवत् प्रमाण, ऐसा निर्मल ग्यान देने के लिए...ऐसा निर्मल ग्यान है जो निर्मल करे शरीर,और ग्यान मण्डलीक कहै ये चकवै ग्यान कबीर।और ग्यान सब ग्यानडी कबीर ग्यान सो ग्यान,जैसे गोला तोब का अब करता चलै मैदान।और संत सब कूप है, केते झरिया नीर,दादू अगम अपार है ये दरिया सत् कबीर।अबही तेरी सब मिटै, ये जनम मरण की पीर,स्वांस उस्वांस सुमिरले, दादू नाम कबीर।सत् साहिब।जय हो बन्दी छोड़ की।
सतलोक जाना चाहते हो तो कृप्या इस ज्ञान को समझो..
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