सीधी सादी बात हृदय में पहुँचती है :--
48 साल काशी में रहकर वेद का पठन करने वाले विद्वान एक दिन कबीर साहेब जी के पास गए और प्रश्न किया --
"हम इतने सालों से वेद पढ़ रहे हैं कि हमारे रोम-रोम में रचनाएँ बसी पड़ी हैं, फिर भी मेरी बातें लोगों के पल्ले नहीं पड़तीं । और आपकी सीधी सादी बातें उनके हृदय को पहुँच जाती हैं । इसका क्या रहस्य है ?"
कबीर साहेब जी बोले --
बुरा तो नहीं लगेगा ?
वे बोले--
"नहीं"
तो कबीर साहेब जी ने कहा --
" सुनो, तुम कहते हो कागज़ लेखी, मैं कहता हूँ मुझ नयन देखी । तुमने तैरने पर पुस्तक पढ़ी है पर पानी में छलाँग नहीं लगाई है । मैंने जो अनुभव किया है वही कहता हूँ ।"
यह सुनकर पंडितों ने कबीर जी के कदम पकड़ लिए ।
सिद्धान्त :→
सवाल है अनुभव का, प्रेम का, सदा जीवन और उच्च विचार का।
" संत की महिमा वेद न जाने । "
"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भयो न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।"
जब तक आत्मा में छलांग नहीं लगाई तो अनुभवी प्रेम से तुम दूर हो ।
जय हो सत्गुरुदेव जी की ।
जय हो बंदी छोड़ कबीर साहेब जी की ।
सत् साहेब जि
: गुरु को कीजै दण्डवत, कोटि कोटि परनाम ।
कीट न जाने भृंग को, गुरु करले आप समान ।।
गुरूजी को दण्डवत, बन्दगी एवं करोड़ों बार प्रणाम करो । कीड़ा भृंगी के महत्त्व को नहीं जानता, परन्तु भृंगी कीड़े को अपने सदृश बना लेती है, वैसे शिष्य को गुरु अपने सदृश बना लेते हैं ।।
लोक-प्रचलित बात है कि भृंगी (एक प्रकार की मक्खी) छोटे कीड़ों को पकड़कर और अपना शब्द सुनाकर उसे अपना-सा बना लेती है । यधपि यह पारस-पत्थर के समान केवल कल्पित दृष्टान्त ही प्रतीत होता है; तथापि सिद्धान्त में गुरु अपने निर्णय-शब्द सुनाकर शिष्य को अपने सदृश बना ही लेते हैं ।
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