शिष्य होय सरबस नहीं वारै।
हये कपट मुख प्रीति उचारे।।
जो जिव कैसे लोक सिधाई।
बिन गुरु मिले मोहे नहिं पाई।।
गुरु से करै कपट चतुराई।
सो हंसा भव भरमें आई।।
गुरु से कपट शिष्य जो राखै।
यम राजा के मुगदर चाखै।।
जो जन गुरु की निंदा करई।
सूकर श्वान गरभमें परई।।
गुरु की निंदा सुने जो काना।
ताको निश्चय नरक निदाना।।
अपने मुख निंदा जो करई।
परिवार सहित नर्क में पड़ही।।
गुरु को तजै भजै जो आना।
ता पशुवा को फोकट ज्ञाना।।
गुरुसे बैर करै शिष्य जोई।
भजन नाश अरु बहुत बिगोई।।
पीढि सहित नरकमें परिहै।
गुरु आज्ञा शिष्य लोप जो करिहै।।
चेलो अथवा उपासक होई।
गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई।।
निश्चय नर्क परै शिष्य सोई।
वेद पुराण भाषत सब कोई।।
सन्मुख गुरुकी आज्ञा धारै।
अरू पिछे तै सकल निवारै।।
सो शिष्य घोर नर्कमें परिहै।
रुधिर राध पीवै नहिं तरि है।।
मुखपर वचन करै परमाना।
घर पर जाय करै विज्ञाना।।
जहाँ जावै तहाँ निंदा करई।
सो शिष्य क्रोध अग्नि में जरई।।
ऐसे शिष्यको ठाहर नाहीं।
गुरु विमुख लोचत है मनमाहीं।।
बेद पुराण कहै सब साखी।
साखी शब्द सबै यों भाखी।।
मानुष जन्म पाय कर खोवै।
सतगुरु विमुखा जुगजुग रोवै।।
गरीब, गुरु द्रोही की पैड़ पर,
जे पग आवै बीर।
चैरासी निश्चय पड़ै,
सतगुरु कहैं कबीर।।
कबीर, जान बूझ साची तजै,
करैं झूठे से नेह।
जाकि संगत हे प्रभु,
स्वपन में भी ना देह।।
तातै सतगुरु सरना लीजै।
कपट भाव सब दूर करीजै।।
योग यज्ञ जप दान करावै।
गुरु विमुख फल कबहुँ न पावै।
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