वेद कतेब झूठे ना भाई।
झूठे हैं जो समझे नाहीं।।
नरकी नारी जो मर जाई।
के जन्मे के स्वर्ग-नरक समाई।।
पिंडा तरपन जब तुम कीन्हा।
कहो पंडित उन कैसे लीना।।
कुंभक भरभर जल ढरकावे।
जिवत न मिले मरे का पावे।।
जलसे जल ले जलमें दीन्हा।
पित्रान जल पिंडा कब लीन्हा।।
वनखंड मांझ परा सब कोई।
मनकी भटक तजे न सोई।।
आपनके छुंवन करे बिचारा।
करता न लखा परा भर्म जारा।।
परमपरा जैसी चलि आई।
तामें सभन रहा बिलमाई।।
भावार्थ :: -इस रमैणी नं. 23 में साहेब कबीर कह रहे हैं कि वेद (चारों वेद व गीता आदि) तथा कतेब (चार धार्मिक पुस्तक मुसलमान धर्म की तथा बाईबल आदि) झूठे नहीं है। जिन्होंने पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ। वे झूठे है जिन्होंने सर्व समाज को अधूरा मार्ग दे दिया। मानो किसी की पत्नी मर जाती है। वह मरने के बाद या तो दूसरा जन्म ले लेती है या नरक या स्वर्ग चली जाती है या प्रेत बन जाती है। फिर तुमनेजो पिण्ड अर्पण किया उस बेचारी ने कैसे आ कर लिया? अब लोटा भर-भर कर डाल रहे हो। यदि कोई व्यक्ति अपने घर पर है उसके निमित जल डालो फिर देखों उसे मिला या नहीं। जब जीवित को नहीं मिला तो मरे हुए को कैसे प्राप्त हो सकता है? अपने हाथों शरीर जलाकर बनखण्ड में शमशान में डाल आए। फिर उसे पिण्ड दान करते हो। जीवित की सेवा करनी चाहिए मरने के बाद क्या लाभ?।। पितरों को जल देना व्यर्थ।।एक समय साहेब कबीर जी काशी में गंगा दरिया के किनारे पर गए तो देखा बहुत से नादान व्यक्ति गंगा जल का लोटा भर कर सूर्य की तरफ मुख करके वापिस ही जल में डाल रहे हैं, कुछ बाहर पटरी पर डाल रहे हैं। इस अज्ञानता को हटाने के लिए कबीर साहेब दोनों हाथों से गंगा जल बाहर फेंकने लगे। यह देखकर उन शास्त्राविरूद्धसाधकों ने साहेब कबीर से पूछा यह क्या कर रहे हो? कबीर साहेब जी ने पूछा आप क्या कह रहे हो? उन नादानों ने उत्तर दिया कि हम अपने पितरों को स्वर्ग में जलभेज रहे हैं। कबीर साहेब जी ने कहा कि मैंने अपनी झौंपड़ी के पास बगीचा लगाया है। उसकी सिंचाई कर रहा हूँ। यह सुन कर वे भोले व्यक्ति हँसते हुए बोले ::रे मूर्ख कबीर! यह जल आधा कोस कैसे जाएगा? यह तो यहीं पर जमीन सोख रही है।साहेब कबीर जी ने उत्तर दिया कि यदि आपका जल करोड़ों-अरबों कोस दूर पितर लोक में आपके पितरों को प्राप्त हो सकता है तो मेरा बगीचा तो अवश्य पानी से भरा मिलेगा तथा कहा कि हे नादानों! आप कह रहे हो कि स्वर्ग में पानी भेज रहे हैं। क्या स्वर्ग में जल नहीं है? फिर स्वर्ग कहाँ वह तो नरक कहो। इस सारी लीला का तात्पर्य समझ कर उन मार्ग से विचलित साधकों ने साहेब कबीर जी का उपदेश लिया तथा अपना कल्याण करवाया।
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