यो सौदा फिर नाहीं संतों, यो सौदा फिरनाहीं ||टेक||लोहे के सा ताव जात है, काया देह सिराहीं |यो दम टूटै पिण्डा फूटै, हो लेखा दरगह माहीं |तीन लोक और भवन चतुर्दश, यो जग सौदे आई |दूने तीने किये चौगने, किनहूं मूल गंवाई |उस दरगह में मार पड़ेगी, जम पकरैंगें बाहीं |वा दिन की मोहि डरनी लागै, लज्या रहै केनाहीं |नर नारायण देह पाय कर, फिर चौरासी जाहीं |जा सतगुरु की मैं बलिहारी, जामन मरणमिटाहीं |कुल परिवार सकल कबीला, मसलति एक ठहराई |बांधि पिंजरी आगै धरिया, मडहट में ले जाहीं |अग्नि लगा दिया जदि लंबा, फूकि दिया उसठाहीं |वेद बांधि कर पंडित आये, पीछै गरुड़ पढ़ाहीं |नर सेती फिर पशुवा कीजै, गधा बैल बनाई |छप्पन भोग कहाँ मन बौरे, कुरडी चरने जाई |प्रेतशिला पर जाय बिराजे, पितरों पिंडभराहीं |बहुरि शराध खान कूं आये, काग भये कलि माहीं |जो सतगुरु की संगत करते, सकल कर्म कट जाहीं |अमरपुरी में आसन होते, ना जहाँ धूप न छाहीं |सुरति निरति मन् पवन पियाना, शब्दें शब्द समाई|गरीबदास गलतान महल में, मिले कबीर गोसांई |
Monday, 20 October 2014
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Yo soda phir naihee re santo
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sabad kabir ji ka
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