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Wednesday, 15 October 2014

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कबीर कहते हैं कि ससीम में फँसे हुए लोगों की संगत में मत पड़ों। उनसे अधिक प्रेम की वाणी न बोलो, अन्यथा तुम भी उनकी बातों में फँस जाओगे। जो साधक असीम में अनुरक्त हैं, उन्हीं से तुम अपने हृदय की बात कहो। उन्हीं का संगत करो और उन्हीं की बातों पर चलो।
कबीर केवल राम की, तूँ जिनि छाड़ै ओट ।
घन अहरन बिच लोह ज्यौं, घनो सहै सिरि चोट ।।१४९।।
कबीर कहते हैं कि हे जीव! तू केवल प्रभु का स्मरण कर, केवल उसी को अपना अवलम्ब बना। वही तुझको सब दु:खों मुक्त कर सकता है, अन्यथा जैसे निहाई पर रखा हुआ लोहा हथौड़े की चोट से पीटा जाता है, वैसे ही तुझे सिर पर सांसारिक दु:खों की चोट सहनी पड़ेगी।
कबीर केवल राम कह, सुद्र गरीबी झालि ।
कूर बड़ाई बूड़सी, भारी पड़सी कालि

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