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Wednesday, 15 October 2014

Kabir ji ke dohe

कबीर, तन मेँ शीतल शब्द है, बोले वचन रसाल ।कहै कबीर ता साधु को, गंजि सकै न काल ।।कबीर, चाल बगुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस ।ते मुक्ता कैसे चुगै, पड़े काल के फांस ।।कबीर, गुरु आज्ञा मानै नहीँ, चलै अटपटी चाल ।लोक वेद दोनो गये, आया सिर पर काल ।।कबीर, लागा रहै सतज्ञान सो, सबहीँ बन्धन तोड़ ।कहैँ कबीर वा दास को, काल रहै हथजोड़ ।।कबीर, आधीन ह्वै गुरु भक्ति करु, सब कारज सिद्धहोय ।काल जाल भौजाल मेँ, भक्त फँसै नहीँ कोय ।।

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