या ।सतगुरु हेला देकर जगा रहेँ भाई अब तो उठसवेरा हो गया ।।सत्संग जल से मल मल नहा ले, निकाल ले मैल शरीरका ।लोक लाज को छोड़कर बन्दे नाम भज ले कबीरका ।।समय रहते जाग रे बन्दे, पाछे फिर पछतायेगा ।विदा होकर जाएगा संसार से अकेला , जब तुहिचकी भर भर रोयेगा ।।जल्दी ले ले नाम सतगुरु से , तेरा जन्म मरणका रोग मिट जाऐगा ।कहे कबीर तुझे सतलोक ले चलूँ , तु वहाँ आनन्द खूबमनायेगा ।। सत् साहेब ।। जय हो बंदी छोड़की ।।Jeevan Das KarkiwithVikram Singhsiniand31 othersKABIR,नौ मन सुत है उलझिया ये ऋषि मुनि रहे झकमारी |सतगुरु ऐसा सुलझा दे फिर उलझे न दूजी बार ||कबीर साहेब कहते है अध्यात्म मार्ग उलझा पड़ा है और ऋषि मुनि झक मार के चले गए और भक्त समाज को भ्रमित कर अपना अपना अनुभव को सत्य बता कर चले गए इस उलझे मार्ग को सिर्फ सच्चा गुरु सतगुरु ही इसको सुलझा सकता है |सतगुरु पुरुष कबीर है ये कुल के सृजनहार |झूठे गुरुवा मर गए हो गए भूत मसान ||कोई तो निर्गुण में रमा है कोई सर्गुन को मान रहा है कोई परमात्मा को निराकार बताता है कोई साकार , कोई मूर्ति पूजा करता है कोई इसके विरुद्ध है और कोई खुद आत्मा को परमात्मा मानता है ( अहम ब्रह्मास्मि ) और पुराण और उपनिषद को मानने वालो में भी मतभेद है कुछ तो ब्रह्मा से जगत की उत्पत्ति बताते है और कुछ बिष्णु से और शिव जी मानने वाले शिव से संसार की उत्पत्ति बताते है ऐसा इसलिए कियूकी शिव पुराण में शिव ( सदा शिव ) से सब की उत्पत्ति और बिष्णु पुराण में बिष्णु से जगत कीउत्त्पत्ति बताई है | और समाज भ्रमित है |कबीर वाणीअमर लोक से हम चल आये, आये जगत मंझारा हो |सही छाप परवाना लाए, समरथ के करिहरा हो ||जीव दुखी देख भवसागर, इस कारन पग धरा हो |कशी नगर थाना रोपा, जम्बूदीप मंझारा हो ||दस मुकाम की भक्ति बतायीं चौका पान विस्तार हो |बारह पंथ चलेंगे आगे, काल जाल पसारा हो ||सत्यनाम के वीरा पावे, तब होवे निस्तारा हो |तेरह पीड़ी ज्ञान रजधानी, हम ही ले अवतारा हो ||सार नाम को करा उजागर, तब मुक्त होवे संसारा हो |बारह पंथ मिलेंगे आयीं, छोड़ कपट चतुराई हो ||पांच हज़ार पांच सौ बीते, सत्य चाल ठहराई हो |काल जाल से सोई बचेगा, जो गुरु के शरणा आयीं हो ||सतगुरु शरण बिन जो भी रहेगा, कैसे हंस कहाई हो |जो कोई सज्जन होई विवेकी, सुनत मिलेगा धाई हो.......................................................................................धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।।यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो एक राम नियारा।।यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवोंका भरम नशाओ।।अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रयदेवनकी उत्पति भाई।।कुछ संक्षेप कहों गुहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।।भरम गये जग वेद पुराना। आदि रामका का भेद न जाना।।राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोइ बिरला जाने।।ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।मां अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।।माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।।कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।।पेट से देवी करी पुकारा। साहब मेरा करो उबारा।।टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।।सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि।।माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई।।अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।।धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा।।धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।।तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।.................................................................................................यो सौदा फिर नाहीं संतों, यो सौदा फिर नाहीं ||टेक||लोहे के सा ताव जात है, काया देह सिराहीं |यो दम टूटै पिण्डा फूटै, हो लेखा दरगह माहीं |तीन लोक और भवन चतुर्दश, यो जग सौदे आई |दूने तीने किये चौगने, किनहूं मूल गंवाई |उस दरगह में मार पड़ेगी, जम पकरैंगें बाहीं |वा दिन की मोहि डरनी लागै, लज्या रहै के नाहीं |नर नारायण देह पाय कर, फिर चौरासी जाहीं |जा सतगुरु की मैं बलिहारी, जामन मरण मिटाहीं |कुल परिवार सकल कबीला, मसलति एक ठहराई |बांधि पिंजरी आगै धरिया, मडहट में ले जाहीं |अग्नि लगा दिया जदि लंबा, फूकि दिया उस ठाहीं |वेद बांधि कर पंडित आये, पीछै गरुड़ पढ़ाहीं |नर सेती फिर पशुवा कीजै, गधा बैल बनाई |छप्पन भोग कहाँ मन बौरे, कुरडी चरने जाई |प्रेतशिला पर जाय बिराजे, पितरों पिंड भराहीं |बहुरि शराध खान कूं आये, काग भये कलि माहीं |जो सतगुरु की संगत करते, सकल कर्म कट जाहीं |अमरपुरी में आसन होते, ना जहाँ धूप न छाहीं |सुरति निरति मन् पवन पियाना, शब्दें शब्द समाई |गरीबदास गलतान महल में, मिले कबीर गोसांई |jai ho bandichhor satguru rampal ji maharaj ki.............sat saheb - SOCIAL MEDIA NEWS LATEST NEWS UPCOMING MOVIES MOVIE REVIEVS

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Saturday, 25 October 2014

या ।सतगुरु हेला देकर जगा रहेँ भाई अब तो उठसवेरा हो गया ।।सत्संग जल से मल मल नहा ले, निकाल ले मैल शरीरका ।लोक लाज को छोड़कर बन्दे नाम भज ले कबीरका ।।समय रहते जाग रे बन्दे, पाछे फिर पछतायेगा ।विदा होकर जाएगा संसार से अकेला , जब तुहिचकी भर भर रोयेगा ।।जल्दी ले ले नाम सतगुरु से , तेरा जन्म मरणका रोग मिट जाऐगा ।कहे कबीर तुझे सतलोक ले चलूँ , तु वहाँ आनन्द खूबमनायेगा ।। सत् साहेब ।। जय हो बंदी छोड़की ।।Jeevan Das KarkiwithVikram Singhsiniand31 othersKABIR,नौ मन सुत है उलझिया ये ऋषि मुनि रहे झकमारी |सतगुरु ऐसा सुलझा दे फिर उलझे न दूजी बार ||कबीर साहेब कहते है अध्यात्म मार्ग उलझा पड़ा है और ऋषि मुनि झक मार के चले गए और भक्त समाज को भ्रमित कर अपना अपना अनुभव को सत्य बता कर चले गए इस उलझे मार्ग को सिर्फ सच्चा गुरु सतगुरु ही इसको सुलझा सकता है |सतगुरु पुरुष कबीर है ये कुल के सृजनहार |झूठे गुरुवा मर गए हो गए भूत मसान ||कोई तो निर्गुण में रमा है कोई सर्गुन को मान रहा है कोई परमात्मा को निराकार बताता है कोई साकार , कोई मूर्ति पूजा करता है कोई इसके विरुद्ध है और कोई खुद आत्मा को परमात्मा मानता है ( अहम ब्रह्मास्मि ) और पुराण और उपनिषद को मानने वालो में भी मतभेद है कुछ तो ब्रह्मा से जगत की उत्पत्ति बताते है और कुछ बिष्णु से और शिव जी मानने वाले शिव से संसार की उत्पत्ति बताते है ऐसा इसलिए कियूकी शिव पुराण में शिव ( सदा शिव ) से सब की उत्पत्ति और बिष्णु पुराण में बिष्णु से जगत कीउत्त्पत्ति बताई है | और समाज भ्रमित है |कबीर वाणीअमर लोक से हम चल आये, आये जगत मंझारा हो |सही छाप परवाना लाए, समरथ के करिहरा हो ||जीव दुखी देख भवसागर, इस कारन पग धरा हो |कशी नगर थाना रोपा, जम्बूदीप मंझारा हो ||दस मुकाम की भक्ति बतायीं चौका पान विस्तार हो |बारह पंथ चलेंगे आगे, काल जाल पसारा हो ||सत्यनाम के वीरा पावे, तब होवे निस्तारा हो |तेरह पीड़ी ज्ञान रजधानी, हम ही ले अवतारा हो ||सार नाम को करा उजागर, तब मुक्त होवे संसारा हो |बारह पंथ मिलेंगे आयीं, छोड़ कपट चतुराई हो ||पांच हज़ार पांच सौ बीते, सत्य चाल ठहराई हो |काल जाल से सोई बचेगा, जो गुरु के शरणा आयीं हो ||सतगुरु शरण बिन जो भी रहेगा, कैसे हंस कहाई हो |जो कोई सज्जन होई विवेकी, सुनत मिलेगा धाई हो.......................................................................................धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।।यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो एक राम नियारा।।यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवोंका भरम नशाओ।।अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रयदेवनकी उत्पति भाई।।कुछ संक्षेप कहों गुहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।।भरम गये जग वेद पुराना। आदि रामका का भेद न जाना।।राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोइ बिरला जाने।।ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।मां अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।।माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।।कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।।पेट से देवी करी पुकारा। साहब मेरा करो उबारा।।टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।।सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि।।माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई।।अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।।धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा।।धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।।तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।.................................................................................................यो सौदा फिर नाहीं संतों, यो सौदा फिर नाहीं ||टेक||लोहे के सा ताव जात है, काया देह सिराहीं |यो दम टूटै पिण्डा फूटै, हो लेखा दरगह माहीं |तीन लोक और भवन चतुर्दश, यो जग सौदे आई |दूने तीने किये चौगने, किनहूं मूल गंवाई |उस दरगह में मार पड़ेगी, जम पकरैंगें बाहीं |वा दिन की मोहि डरनी लागै, लज्या रहै के नाहीं |नर नारायण देह पाय कर, फिर चौरासी जाहीं |जा सतगुरु की मैं बलिहारी, जामन मरण मिटाहीं |कुल परिवार सकल कबीला, मसलति एक ठहराई |बांधि पिंजरी आगै धरिया, मडहट में ले जाहीं |अग्नि लगा दिया जदि लंबा, फूकि दिया उस ठाहीं |वेद बांधि कर पंडित आये, पीछै गरुड़ पढ़ाहीं |नर सेती फिर पशुवा कीजै, गधा बैल बनाई |छप्पन भोग कहाँ मन बौरे, कुरडी चरने जाई |प्रेतशिला पर जाय बिराजे, पितरों पिंड भराहीं |बहुरि शराध खान कूं आये, काग भये कलि माहीं |जो सतगुरु की संगत करते, सकल कर्म कट जाहीं |अमरपुरी में आसन होते, ना जहाँ धूप न छाहीं |सुरति निरति मन् पवन पियाना, शब्दें शब्द समाई |गरीबदास गलतान महल में, मिले कबीर गोसांई |jai ho bandichhor satguru rampal ji maharaj ki.............sat saheb

कहा सोवे इस मोह माया की रैँन मे बन्देकहा सपनोँ मे खो गया ।सतगुरु हेला देकर जगा रहेँ भाई अब तो उठसवेरा हो गया ।।सत्संग जल से मल मल नहा ले, निकाल ले मैल शरीरका ।लोक लाज को छोड़कर बन्दे नाम भज ले कबीरका ।।समय रहते जाग रे बन्दे, पाछे फिर पछतायेगा ।विदा होकर जाएगा संसार से अकेला , जब तुहिचकी भर भर रोयेगा ।।जल्दी ले ले नाम सतगुरु से , तेरा जन्म मरणका रोग मिट जाऐगा ।कहे कबीर तुझे सतलोक ले चलूँ , तु वहाँ आनन्द खूबमनायेगा ।। सत् साहेब ।। जय हो बंदी छोड़की ।।Jeevan Das KarkiwithVikram Singhsiniand31 othersKABIR,नौ मन सुत है उलझिया ये ऋषि मुनि रहे झकमारी |सतगुरु ऐसा सुलझा दे फिर उलझे न दूजी बार ||कबीर साहेब कहते है अध्यात्म मार्ग उलझा पड़ा है और ऋषि मुनि झक मार के चले गए और भक्त समाज को भ्रमित कर अपना अपना अनुभव को सत्य बता कर चले गए इस उलझे मार्ग को सिर्फ सच्चा गुरु सतगुरु ही इसको सुलझा सकता है |सतगुरु पुरुष कबीर है ये कुल के सृजनहार |झूठे गुरुवा मर गए हो गए भूत मसान ||कोई तो निर्गुण में रमा है कोई सर्गुन को मान रहा है कोई परमात्मा को निराकार बताता है कोई साकार , कोई मूर्ति पूजा करता है कोई इसके विरुद्ध है और कोई खुद आत्मा को परमात्मा मानता है ( अहम ब्रह्मास्मि ) और पुराण और उपनिषद को मानने वालो में भी मतभेद है कुछ तो ब्रह्मा से जगत की उत्पत्ति बताते है और कुछ बिष्णु से और शिव जी मानने वाले शिव से संसार की उत्पत्ति बताते है ऐसा इसलिए कियूकी शिव पुराण में शिव ( सदा शिव ) से सब की उत्पत्ति और बिष्णु पुराण में बिष्णु से जगत कीउत्त्पत्ति बताई है | और समाज भ्रमित है |कबीर वाणीअमर लोक से हम चल आये, आये जगत मंझारा हो |सही छाप परवाना लाए, समरथ के करिहरा हो ||जीव दुखी देख भवसागर, इस कारन पग धरा हो |कशी नगर थाना रोपा, जम्बूदीप मंझारा हो ||दस मुकाम की भक्ति बतायीं चौका पान विस्तार हो |बारह पंथ चलेंगे आगे, काल जाल पसारा हो ||सत्यनाम के वीरा पावे, तब होवे निस्तारा हो |तेरह पीड़ी ज्ञान रजधानी, हम ही ले अवतारा हो ||सार नाम को करा उजागर, तब मुक्त होवे संसारा हो |बारह पंथ मिलेंगे आयीं, छोड़ कपट चतुराई हो ||पांच हज़ार पांच सौ बीते, सत्य चाल ठहराई हो |काल जाल से सोई बचेगा, जो गुरु के शरणा आयीं हो ||सतगुरु शरण बिन जो भी रहेगा, कैसे हंस कहाई हो |जो कोई सज्जन होई विवेकी, सुनत मिलेगा धाई हो.......................................................................................धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।।यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो एक राम नियारा।।यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवोंका भरम नशाओ।।अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रयदेवनकी उत्पति भाई।।कुछ संक्षेप कहों गुहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।।भरम गये जग वेद पुराना। आदि रामका का भेद न जाना।।राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोइ बिरला जाने।।ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।मां अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।।माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।।कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।।पेट से देवी करी पुकारा। साहब मेरा करो उबारा।।टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।।सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि।।माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई।।अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।।धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा।।धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।।तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।.................................................................................................यो सौदा फिर नाहीं संतों, यो सौदा फिर नाहीं ||टेक||लोहे के सा ताव जात है, काया देह सिराहीं |यो दम टूटै पिण्डा फूटै, हो लेखा दरगह माहीं |तीन लोक और भवन चतुर्दश, यो जग सौदे आई |दूने तीने किये चौगने, किनहूं मूल गंवाई |उस दरगह में मार पड़ेगी, जम पकरैंगें बाहीं |वा दिन की मोहि डरनी लागै, लज्या रहै के नाहीं |नर नारायण देह पाय कर, फिर चौरासी जाहीं |जा सतगुरु की मैं बलिहारी, जामन मरण मिटाहीं |कुल परिवार सकल कबीला, मसलति एक ठहराई |बांधि पिंजरी आगै धरिया, मडहट में ले जाहीं |अग्नि लगा दिया जदि लंबा, फूकि दिया उस ठाहीं |वेद बांधि कर पंडित आये, पीछै गरुड़ पढ़ाहीं |नर सेती फिर पशुवा कीजै, गधा बैल बनाई |छप्पन भोग कहाँ मन बौरे, कुरडी चरने जाई |प्रेतशिला पर जाय बिराजे, पितरों पिंड भराहीं |बहुरि शराध खान कूं आये, काग भये कलि माहीं |जो सतगुरु की संगत करते, सकल कर्म कट जाहीं |अमरपुरी में आसन होते, ना जहाँ धूप न छाहीं |सुरति निरति मन् पवन पियाना, शब्दें शब्द समाई |गरीबदास गलतान महल में, मिले कबीर गोसांई |jai ho bandichhor satguru rampal ji maharaj ki.............sat saheb

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