श्री गीता जी रहस्य।।अथ सर्व लक्षणा ग्रन्थ ।सर्व लक्षणा ग्रन्थ महाराज जी द्वारा रिचत बहुतही सुंदर वाणी है । इस वाणी मेंसभी लक्षणों का एकित्रत वर्णन किया गया हैइसलीए इसका नाम सर्व लक्षणा ग्रन्थ है ।उत्तम कुल कर्तार दे, द्वादश भूषण संग । रूप द्रव्य देदया करि, ज्ञान भजन सत्संग ।।१।।हे प्रभू! आप मुझे अच्छा भक्तिमय कुल दें, साथ मेंअपना द्वादश नाम रूपी भुषण दें । आप मुझ परदया करके सुंदर रूप़, राम नाम का धऩ, अध्यात्मिकज्ञान परमेश्वर का भजन और संतों का सतसंग देनेकी कृपा करें।यहां उत्तम कुल का तात्पर्य ऊचीं या श्रेष्ठ जाती सेनहीं बल्कि ऐसे कुल से है जिसमें भक्तिमय वातावरणहो संतों माहापुरूषों की सेवा होती हो।क्योंकी महाराज जी राग आसावरी में स्पष्ट कहते हैंकी इस भ्रम में मत रहो की सिर्फ ऊंचे कुल ब्रह्मण इ. मेंपैदा होने से ही भक्ति होगी ।यथासंतो भर्म परौ मति कोई । ऊंचे कुल से भक्ति न होई।।टेक।।ऊंचे कुल में नाश होत है़, नीचा ही कुल दीजै ।तपिया कूं तो दशर्न नाहीं, लोदी नालि पतीजै ।।१।।६९।। राग आसावरी पृ. क्र. ९४१इसी तरह राग बिहंगम बरवै में जो छोटी जाती मेंजन्म लेकर भी नाम के प्रभाव के कारण ऊंचे हो गएउनके बारे में कहते हैंनीच कौन है रे, ब्रह्म पिछानि नीच कौन है ।।टेक।।बालनीक कूं कहते नीच । नाम प्रताप हो गये ऊंच ।।१।।२१।। राग बिहंगम बरवै पृ ८४५शिल संतोष विवेक दे, क्षमा दया एकतार । भावभक्ति बैराग दे, नाम निरालम्ब सार ।।२।।हे प्रभू! आप मुझे अच्छा नैतीक आचरण, संतोष वृत्ति ,विवेक बुद्धि दो, सब को क्षमा करने और सबप्राणियों पर दया करने का सामर्थ्य दो, तथा सबकेप्रति सम दृष्टि दिजिए । हे प्रभू मुझेप्रेमा भक्ति दो, मुझे वैराग दो जिससेमेरी वृत्ति संसार से हट जाए । हे आधार रिहतनिरालम्ब परमेश्वर मुझे अपना सारभुत नाम दें ।योग युक्ति जगदीश दे, सूक्ष्म ध्यान दयाल ।अकलि अकीन अजन्म जति, अष्टसिद्धि नौ निधि ख्याल ।।३।।हे जगदीश मुझे आपसे जुडने (योग) की विधी (युक्ति)बता दिजीये और हे दयालु मुझे सुक्षम ध्यान योगदिजीये । हे प्रभू योग के द्वारा प्राप्त होनेवाली आठ सिद्धियां और नौ निधियां तो ख्यालमात्र हैं आप मुझे समझ और विश्वास दिजीए जिससे मैंअजन्मा अथार्त जन्म मरण से रिहत होकर जीत जाऊं।स्वर्ग नरक बांचै नहीं, मोक्ष बंधन से दूर ।बड़ी गरीबी जगत में, संत चरण रज धूर ।।४।।हे प्रभू! मुझे स्वर्ग या नरककी कामना नहीं तथा चार मुक्तियों के मोहरूपी बंधन से मैं दुर हूं । हे प्रभू बहुत दुलर्भ होने के कारणसंतों के चरण रज की धुर की इस संसार में बहुत कमी हैआप मुझे वही दिजीए।जीवत मुक्ता सो कहौ, आशा तृष्णा खण्ड । मन केजीते जीत है, क्यों भरमैं ब्रह्मण्ड ।।५।।महाराज जी कहते हैं की जिसने आशा औरतृष्णा को छोड दिया वह जीव जीते जी मुक्त है ।तात्पर्य यह है की ऐसे व्यक्ति को मुक्त होने के लिएमृत्यु का इंतजार नहीं करना पडता बल्कि वहतो नित्य मुक्त होता है । इस संसार पर विजय प्राप्तकरने के लिए क्यों व्यर्थ ही संसार में भटक रहे हो |मन को जीत लेने पर ही वास्तव में संसारको जिता जा सकता है ।शाला कर्म शरीर में, सतगुरू दिया लखाय । गरीबदासगलतान पद, नहीं आवैं नहीं जाय ।।६।।आचार्य श्री गरीब दास जी महाराज कहते हैकी सतगुरू जी ने हमें हमारे शरीर में शुध्द सच्चे कर्म(क्रिया) का ज्ञान करवा दिया जिससे की हमहमेशा परमेश्वर में लीन रहते हुए आने जाने (जन्ममृत्यु )के चक्कर से मुक्त हो गए ।चौरासी की चाल क्या, मो सेती सुनि लेह ।चोरी जारी करत हैं, जाके मौंहडे खेह ।।७।।चौरासी लाख योनीयों के जीवों की गती कैसी हैयह मुझसे सुन लिजिए, यह सब जीव चोरी इ. करते हैं |इनके मुख में राख डालनी चाहिए ।काम क्रोध मद लोभ लट, छुटी रहै विकराल । क्रोधकसाई उर बसै, कुशब्द छुरा घर घाल ।।८।।इनके अंदर काम, क्रोध, मद और लोभ की भयानक लहरेंछुट रही हैं । इनके उर में क्रोध नामक कसाई बसा हुआहै जो बुरे शब्द रूपी छुरे से बडे गहरे घाव कर रहा है ।हर्ष शोक हैं श्वान गति, संसा सर्प शरीर । राग द्वेषबड़ रोग हैं, जम के परे जंजीर ।।९।।इनके खुशी और गम कुत्तो के समान होते है। जैसे कुत्तेको अपनी पसंद की वस्तु मिलने पर वह खुशी में इधरउधर भागता हुआ खुशी का अत्याधिक इजहारकरता है और दुखी होने पर मुंह उपर को उठाकरविभत्स तिरके से रोने लगता है । उसी तरहका व्यवहार संसारीक जीव सुख दुख में करते हैं ।तथा शंका सर्प के शारीर की भांति है| किसी केप्रती प्रेम और दुसरे के प्रती इर्षा यह दोनों सबसे बडेरोग हैं यह यमदुत की जंजीर के समान हैं ।आशा तृष्णा नदी में, डूबे तीनौं लोक ।मनसा माया बिस्तरी, आत्म आत्म दोष ।।१०।।तीनों लोकों के जीव आशा और तृष्णा रूपी नदी मेंडूबे हुए हैं । अथार्त सभी जीव आशा औरतृष्णा रूपी नदी में बहे जा रहे हैं कभी इससे बहरनहीं निकलते । (प्रत्येक व्यक्ति के अपने अवगुणों केअनुसार) मन से उत्पन्न हुई (इच्छा नामक)माया (नदी) फैली हुई है ।एक शत्रु एक मित्र है, भूल पड़ी रे प्राण । जमकी नगरी जाहिगा, शब्द हमारा मान ।।११।।सब जीवों को एक बहुत बडी गलत फहमी (भूल) हो गईहै सभी एक को अपना शत्रु और दुसरे को मित्र कहते है। ऐसा समझने वाले सभी जीव जम की नगरी नरकको जाएंगे हमारी यह बात तुम पक्की मानो ।निंद्या बिंद्या छाडि दे, संतों सूं कर प्रीत ।भवसागर तिर जात है, जीवत मुक्ति अतीत ।।१२।।तुम निंदा और स्तुती दोनों को छोडकर संतों से प्रेमकरो। जिससे की तुम जीवन मुक्त होकर इस भवसागरसंसार से पार हो जाओगे ।जे तेरे उपजै नहीं, तो शब्द साखि सुनि लेह ।साक्षीभूत संगीत है, जासे लावो नेह ।।१३।।अगर तुम्हारे अंदर स्वंयम ही सद सद विवेक बुद्धि से यहबात उत्पन्न नहीं होती, तो हमारे इस सच्चे शब्दको सुन लो की साक्षीभूत परमात्मा सदा तुम्हारेसंग है तुम उसी से अपना नाता जोडो ।स्वर्ग सात असमान पर, भटकत है मन मुढ़ । खालिकतो खोया नहीं, इसी महल में ढूंढ़ ।।१४।।अरे पागल मन कहां सातों स्वगर् में भटक रहा है ।परमेश्वर कहीं खोया नहीं तुं उसे अपने शरीर में ही ढूंढ।कर्म भर्म भारी लगे, संसा सूल बबूल ।डाली पांनौं डोलते, परसत नांही मूल ।।१५।।परमेश्वर प्राप्ती के लिए किए जाने वाले कर्म कांडचक्कर में डालने वाले और बहुत कठीन है। और इनसेशंका ही उत्पन्न होती है जो कांटे की तरहचुभती रहती है । तुम डालीयां औरपत्तों को ही पुजते रहते हो लेकीन जड़ को नहीं पुजते। अथार्त तुम नाना भांती के छोटे बडे देवी देवताओंको पुजते हो लेकीन सबके आधार सर्व व्यापक परमपिता परमेश्वर को नहीं पुजते ।श्वासा ही में सार पद, पद में श्वासा सार । दमदेही का खोज कर, आवागवन निवार ।।१६।।हमारे श्वासों में ही परम पद है, अथार्त हमारे श्वासबहुमूल्य हैं जब तक यह हैं तब तक ही तुम उस परम पदको प्राप्त कर सकते हो| इसलिएअपनी सांसों को उस परम पद की खोज में लगा दो।अपने श्वास और शरीर को खोजकर जन्म मरण केचक्कर से मुक्ति हो जाओ ।बिन सतगुरू पावै नहीं, खालिक खोज विचार ।चौरासी जग जात है, चीन्हत नांही सार ।।१७।।लेकीन बिना सच्चे गुरू के तुम्हें परमेश्वर को खोजनेकी समझ नहीं आएगी । यह सारा संसारचौरासी लाख योनीयों में घुम रहा है लेकीन उन्हें इससार बात की समझ नहीं आती ।मरद गर्द में मिल गये, रावण से रणधीर । कंस केश चाणूरसे, हिरणाकुश बलबीर ।।१८।।रावण जैसे रण में धैर्य से टिके रहने वाले, कंसकेशी चाणूर और हिरणाकुश जैसे महा बलशाली पुरूषधुल में मिल गए ।तेरी क्या बुनियाद है, जीव जन्म धर लेत । गरीबदासहरी नाम बिन, खाली परसी खेत ।।१९।।फिर तेरे जैसे जन्म लेने वाले (तुछ) जीवकी क्या बुनियाद है । आचार्य श्री गरीबदासजी महाराज कहते हैं की हे प्राणीयों प्रभु के नाम केबिना तुम्हारा यह शरीर(खेत) व्यर्थ (खाली) है ।।।सत साहिब ।।
Wednesday, 15 October 2014
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अथ सर्व लक्षणा ग्रन्थ
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mahraj garib dass ji ki vaani
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