पहली आरती हरि दरबारे, तेज पुंज जहाँ प्राण उधारें ||१ ||पाती पंच पौहप कर पूजा, देव निरंजन और न दूजा || २ ||खण्ड खण्ड में आरती गाजै, सकल मयी हरि जोत विराजै || ३ ||शांति सरोवर मज्जन कीजै, जत की धोती तन पर लीजै || ४ ||ग्यान अंगोछा मैल न राखै, धर्म जनेऊ सत् मुख भाखे || ५ ||दया भाव तिल मस्तक दीजै, प्रेम भक्ति का अचमन लीजै || ६ ||जो नर ऐसी कार कमावै , कंठी माला सहज समावै || ७ ||गायत्रि सो जो गिनती खोवै, तर्पण सो जो तमक न होवे || ८ ||संध्या सो जो संधि पिछाने, मन पसरे कुं घर में आने || ९ ||सो संध्या हमरे मन मानी, कहै कबीर सुनो रे ज्ञानी || १० ||अर्थ : सब से पहले मैं परमेश्वर के दरवार में आरती करता हूं | जहाँ पर वह प्रकाश स्वरुप परमेश्वर, सब प्राणियों का उद्धार करता है |उस परमेश्वर की पुजा अपनी पांचों इन्द्रियों (जो की किसी फुल के पांच पत्तों के समान हैं) का फुल बना कर करो |अर्थात तुं अपनी बहिर मुखी पांचों इन्द्रियोंको पुष्प के समान केंद्रित करके उस एक परमेश्वर की पुजा कर | संसार से अपनी इन्द्रियों को हटा कर परमेश्वर की पुजा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध से कर | वह परमेश्वर माया से रहित है, उस के सिवा दूसरा कोई नहीं |हर एक कण में उस परमेश्वर की आरती गूंज रही है, सभी में हरि(परमात्मा) की ज्योत विराजमान है |उस परमेश्वर की आरती करने के लिए तुं अपने मन को एकाग्र करके शांति के सरोवर में स्नान कर | जिस प्रकार धोती को अपने तन पर धारण करता है उसी प्रकार तुं संयम को धारण कर |जिस प्रकार तुं तोलिये से अपने शरीर की मैल साफ करता है उसी तरह ज्ञान से अपनेमन की मैल को दूर कर | तेरे धर्म का प्रतिक यह जनेऊ नहीं बल्कि सच्च बोलना ही तेरा धर्म है तुं इसी जनेऊ को धारण कर |दया की भावना का तुं अपने माथे पर तिलक लगा अर्थात दया भाव को अपनी बुद्धि मेंहमेशा बनाये रख | और सब से प्रेम करता हुआ प्रेम भगति का पान कर|जो मनुष्य ऐसे नियमों का पालन करता है उसका अपने आप ही सिमरन चल पडता है उसे लोक दिखावे के लिए गले में माला नहीं डालनी पडती | अर्थात वह सहज भाव से ही हरश्वास के साथ परमेश्वर का स्मरण करता रहता है |जो श्वास श्वास के साथ नाम स्मरण करे, जिसका अजपा जाप चल पडे, जो हर समय अपने मूल स्वरुप में खोया रहे उसे गिनती के हिसाब से माला या गायत्री जप करने की जरुरत नहीं, वह तो हमेशा ही गायत्री जाप करता रहता है |जिसके अंदर का अंधकार मिट गया समझो वह संतुष्ट हुआ, उसका तर्पण हो गया |वास्तव में संध्या तो वही है जिसमे साधक जिव और ब्रह्म की एकता को पहचानता है और बाह्य पदार्थों में फैले हुए मन को समेट कर, अपने भीतर(घर) में स्थित परमेश्वर में लगा देता है | यही सच्ची संध्या आरती पुजा है |सदगुरु कबीर साहिब जी महाराज कहते हैं की हे विचारवान जिज्ञासुओ सुनो यही संध्या हमारे मन को अच्छी लगती है |
Saturday, 25 October 2014
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