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Wednesday, 15 October 2014

Arth saaton vaar ki ramaini

आचार्य श्री गरीब दास महराज जी नें इस बानी के द्वारा हफ्ते केसभी दिनों में साधक किस प्रकार अपने आप को परमेश्वर प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाए, इसका बहुत सुन्दर निरूपण किया है | साथ हि परमेश्वर के भगत के लिए नौ ग्रह किस तरह अनुकूल हो जातेहैं, इसका भी सुन्दर वर्णन कियाहै|सातों बार समूल बखानौं, पहर घड़ीपल ज्योतिष जानौं ||१||ज्योतिष = तारों और ग्रहों के द्वारा समय का ज्ञान और इन तारों और ग्रहों के द्वारा होने वाले प्रभाव का ज्ञान|(मैं अब सप्ताह के) सातों दिनों का शुरू से वर्णन करता हूं | पहर, घड़ी और पल के द्वारा ज्योतिष (समय) को जाना जाता है| (अर्थात पहर, घड़ी और पल की सही गणना से एक दिन का समय और दिनों की गणना से सात वार बनते हैं| इस काल गणना को ज्योतिष कहते हैं|)ऐतवार अन्तर नहीं कोई, लगी चांचरी पद में सोई ||२||चांचरी = योग की पांच मुद्राओं (चांचरी, भुचरी, अगोचरी, खेचरी और उन्मनी) में से एक मुद्रा जिसमे मन को स्थिर करने के लिए अपनी दृष्टि को नासा के अग्र भाग में स्थिर किया जाता है| अर्थात अपनी दृष्टि को स्थिर कर मन को स्थिर किया जाता है|इतवार के दिन जिस के अंतर (मन) में कोई भी विकार न उठे, या जिसके अंदर परमेश्वर की याद के बिना दूसरा कोई ना हो उसकी दृष्टि (चांचरी मुद्रा के द्वारा) परम पद (परमेश्वर) में लगी रहती है |सोम संभाल करो दिन राती, दूर करो नै दिल की काती ||३||काती = मैल|सोमवार के दिन परम पद की प्राप्ति के लिए अपनी चित्त वृत्ति को संभाल कर दिन रात परमेश्वर में लगाये रखो | और अपने मन की सारी मैल उतार दो | फिरमंगल मन की माला फेरो, चौदा कोटि जित जम जेरो ||४||जेरो = आधीन करनामंगलवार को अपने साफ मन से प्रभु का सुमिरन करते हुए यमराज के चौदह करोड़ यमदूतों को जित कर अपने आधीन कर लो | फिरबुध बिनानी विद्या दीजै, सत सुकृत निज सुमरन कीजै ||५||बिनानी = ब्रह्म, परमेश्वर| सत= सच्चा |सुकृत = अच्छे कर्मनिज = स्वयं उसका, प्रधान, निश्चित रूप से, पूरी तरह सेबुधवार के दिन परमेश्वर से उस के ज्ञान (ब्रह्म ज्ञान) देने की प्रार्थना करते हुए सच्चे और सब का अच्छा करने वाले परमेश्वर का निश्चय पूर्वक सुमिरन करो | फिरबृहस्पति भ्यास भये बैरागा, तातैं मन राते अनुरागा ||६||भ्यास = अभ्यास|अनुरागा = शुद्ध भाव से किसीकी ओर प्रवृत्त होना या मन लगाना, प्रेम या स्नेह|गुरुवार के दिन अभ्यास से तुम्हारे अंदर वैराग पैदा होगाजिससे मन परमेश्वर के प्रेम में मग्न हो जायेगा| और फिरशुक्र साला कर्म बताया, जद मन मान सरोवर नहाया ||७||साला = शुद्ध|शुक्रवार को जब अनुराग युक्त मन प्रेम के सागर (मान सरोवर) में नहाया तो सभी कर्म शुद्ध होगए | औरसनीचर स्वसा माहिं समोया, जब हममक्रतार मग जोया ||८||मक्रतार = मकड़ी के जले की तार, सुरति कमल, सहस्त्र दल कमल|मग = मार्ग|शनिचर वार को जब हमने सुरति कमल(सहस्र दल कमल) के मार्ग/डोर को पा लिया तो वह परमेश्वर हमारे श्वासों में समा गया | (या शनि हमारी सांसों में समां गया|) औरराहु केतु रोकैं नहीं घाटा, सतगुरु खोलै बज्र कपाटा ||९||घाटा = मार्गजब मेरे सतगुरु बज्र के समान मजबूत दशम द्वार के दरवाजों को खोल देते हैं, तो फिर राहु और केतु भी उस का मार्ग नहीं रोकते|नौ ग्रह नमन करै निरबाना, अविगतनाम निरालंभ जाना ||१०||निरबाना = मुक्ति, यह वह अवस्थाहै जिसमें जीव सब प्रकार से संस्कारों से रहित हो जाता है और जन्म-मरण के चक्कर से छुट जाता है |अविगत = जिसे जाना ना जा सके| जिसका नाश ना हो| निरालंभ = आधार से रहितजिस ने उस वर्णन ना किये जा सकने वाले, आधार रहित परमेश्वर के नाम को जान लिया, वह निरबान पद को प्राप्त कर लेता है| उसे नौ ग्रह झुककर नमस्कार करते हैं |नौ ग्रह नाद समोये नासा, सहस कमल दल कीन्हा बासा ||११||जिसने सहस्त्र दल कमल में निवास किया है| उसके अंदर उठने वाली नाम की ध्वनि (अनहद नाद) में नौ ग्रह समाकर नष्ट हो जातेहैं |दिशा सूल दहौं दिस का खोया, निरालंभ निरभै पद जोया ||१२||दिशाशूल = वह घड़ी, पहर या दिन जिसमें किसी विशिष्ट दिशा की ओर जाना बहुत अनिष्टकार माना जाता है|जिसने भय से रहित, आधार रहित परम पद को पा लिया उसके लिए दसों दिशा में दिशाशूल खत्म हो जाता है|कठन विषम गति रहन हमारी, कोई ना जानत है नर नारी ||१३||आचार्य जी कहते हैं की हमारा ज्ञान बहुत कठिन और टेढा है | इसे कोई भी नर यानारी नहीं जान सकता| अर्थात हर कोई हमारी रहनी को नहीं समझ सकता |चन्द्र समूल चिंतामणि पाया, गरीबदास पद पदहि समाया ||१४||चिंतामणि =. एक मणि या रत्न जो सभी इछा पूरी करता है, परमात्मा|बाबा गरीब दास महाराज जी कहते हैं की सभी चिंताओं को दूर करनेवाले चिंतामणि रूपी परम तत्व चन्द्र रूपी मूल तत्व को प्राप्त करके हम परम पद में समागए हैं|

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